Thursday, 12 March 2015

दो यार



बन्दर और भालू में
इक दिन होने लगी तकरार
वैसे थे वो दोनों ही
एक दूसरे के पक्के यार  

बन्दर बोला “तुम जैसा आलसी
देखा नहीं मैंने आज तक”
भालू बोला “तुम ही करते हो
हरदम इतनी ज़्यादा झकझक”

“भालू, तन के तो हो तुम भूरे
पर मन तुम्हारा है काला”
“बन्दर, तुम चालाक हो कितने
यह है सबने देखा भाला.”

बन्दर तब गुस्से से चिल्लाया
“आज खाओगे तुम मुझसे मार”
भालू भी आँख दिखा कर बोला  
“अरे मैं तो हूँ कब से तैयार”

दोनों को लड़ता देख
सभी को आया खूब मज़ा
उनकी शैतानी की उनको
मिलनी थी आज सज़ा.

दोनों मिलकर सब को
करते थे खूब हैरान   
उन बदमाशों के कारण 
हर कोई था खूब परेशान   

पर आज सभी ने
इक अवसर पाया
सब ने ही मिलकर
दोनों को उकसाया

दोनों हो गये आग बबूला
आगा पीछा दोनों ने भूला
एक दूसरे पर टूट पड़े
और लातें घूसें खूब झड़े

भालू का टूट गया इक दाँत
बहने लगा खून नाक से
बन्दर का टूट गया इक हाथ 
टपकने लगे आंसू आँख से.

हाथी ने किया तब बीच-बचाव
और दोनों को डांट लगाई
“हुआ क्या है मुझे बताओ
और बंद करो यह हाथा-पाई”

बन्दर और भालू दोनों
खड़े हो गये मुंह लटका कर
किस बात पर थे वह झगड़े
याद न था यह उनको पर

अब हाथी थोड़ा चकराया
और दोनों पर वह चिल्लाया
“जब बात न थी लड़ने की कोई  
लड़ कर तुम ने क्या पाया”

सब को उन पर आई हँसी
सब ने था उनको उकसाया
“अपनी शैतानी का फल, दादा 
आज है इन दोनों ने पाया”

बन्दर और भालू को अब 
समझ आई भूल अपनी
“अब न करेंगे किसी को तंग
मन में यह हमने ठानी”

© आई बी अरोड़ा

4 comments:

  1. Such a cute poem, it has a deeper message bona baat ladhe dono dusron ke uksane par, that's what is happening in this world these days among countries too.

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