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Sunday, 7 February 2016

गुब्बारा
इक भालू के थे बच्चे दो
नटखट बहुत थे दोनों वो
भालू इक दिन लाया गुब्बारा
रंग बिरंगा प्यारा-प्यारा
गुब्बारा देख बच्चे चिल्लाये
झटपट दोनों दौड़े आये
गुब्ब्बारा लेकर भागे दोनों
झूम खुशी से गये वह दोनों
फिर इक बोला दूजे से
“भइया, गुब्बारा फूला कैसे?”
गुब्बारे को उसने खूब टटोला
खूब सोच कर फिर वह बोला
“भीतर इसके है कोई बला  
तभी तो है यह इतना फूला 
चलो ज़रा कुछ ज़ोर लगायें
जो है भीतर उसे बाहर लायें”
दोनों ने तब पिचकाया गुब्बारा
पटाखे सा फट गया गुब्बारा.

©आइ बी अरोड़ा  

Tuesday, 18 August 2015

शैतान बन्दर
वन में रहता था एक शरारती बन्दर
हर पल कुछ चलता ही रहता था उसके मन के अंदर

था वह बहुत ही नटखट और शैतान
वन के हर प्राणी को उसने कर रखा था परेशान

कभी पकड़ लेता वो पूंछ किसी हिरण की
या खींचता किसी सोये हुए हाथी के कान

कभी किसी खरगोश को था वो खूब डराता
चुपके से आकर खूब ज़ोर से था चिल्लाता

एक बड़ी झील भी थी उस वन में
कई मगरमच्छ रहते थे उस पानी में

उनको तंग करने में आता था बन्दर को खूब मज़ा
एक मगरमच्छ को आया पर कुछ ज़्यादा ही गुस्सा

छोड़ दिया उसने गुस्से में अपना खाना-पीना
बन्दर ने मुश्किल कर दिया था उसका जीना

उस मगरमच्छ ने मन ही मन यह सोचा
शैतान बन्दर को चबा कर खा जाउंगा मैं कच्चा

मगरमच्छ था चालाक हर पल रहता था मुस्कुराता
पर मन में उसके था कुछ और ही चलता

मगरमच्छ था बहुत ही चतुर शिकारी
इक सुबह आ गई उस बन्दर की भी बारी

नटखट बन्दर पी रहा था झील का पानी
मगरमच्छ छिपा था वहीं यह बात बन्दर ने थी न जानी

मगरमच्छ झपटा और किया उसने ऐसा वार
अन्य पशु सब थे सोये, उस दिन था रविवार

मगरमच्छ ने पकड़ लिया बन्दर को सिर से
इस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था वह कब से

अब नटखट बन्दर के उड़ गये होश
पर अभी भी कम हुआ न उसका जोश

वह ज़ोर चिल्लाया, कोई तो मदद करो मेरी, भाया
सब सोये थे कोई न उसकी बात सुन पाया  

फिर भी उस बन्दर ने छोड़ी अपनी आस  
सोचा, मरने से पहले करता हूँ एक और प्रयास

वह मुड़ा और घूमा, फिर घूमा और मुड़ा
वह उछला और कूदा, फिर कूदा और उछला

उसने चलाये अपने हाथ और चलाये अपने पाँव
और न जाने कैसे चल गया उसका यह दांव

उसका पाँव टकराया मगरमच्छ की बायीं आँख से
उसने सोचा यही करना होगा एक बार फिर से

उसने किये मगरमच्छ की आँखों पर अनेकों वार
सीधी चोट लगी मगरमच्छ की आँखों पर हर बार

मगरमच्छ के लिए कठिन हुआ इन चोटों को सहना
बन्दर की बहादुरी का था क्या कहना

जैसे ही दायीं आँख पर पड़ा जोर का वार
मगरमच्छ ने झट से मानी अपनी हार

छूट गया वह बन्दर उस मगरमच्छ की पकड़ से.
झटपट भागा वह जान बचा कर वहां से.

बन्दर था शैतान पर था वह बहुत निडर.
पता ही न लगा किसी को कि भागा वो किधर.

एक वन में रहता है एक बन्दर
वह है थोड़ा नटखट और शैतान

हर पल करता है वह कोई शरारत

कर रखा है उसने सबको बहुत हैरान . 
© आइ बी अरोड़ा


Thursday, 30 July 2015

ग्रैंडफादर क्लॉक

मेरे कमरे में है लटकी
इक पुरानी ग्रैंडफादर क्लॉक,
न करती वह कोई टिक
न करती वह कोई टॉक.

उसके भीतर तो रहता है
नन्हा-सा इक नटखट गोस्ट,
बार-बार वह वो मुझे चिढ़ाता
मुझे बुलाता, ‘सिल्ली दोस्त’.

नन्हें गोस्ट को अच्छा लगता
बातें करना दिन हो या रात,
होम वर्क लेकर जब मैं बैठूं
शुरू हो जाता है उसकी बात.

गर्मी के दिन आते ही वह
चुपके से फ्रिज में घुस जाता,
आइस क्रीम और मीठे जूस
हौले-हौले वो चट कर जाता.

माँ सोचती, ‘अरे, ऐसा काम
कर सकता है कौन भला?’
माँ भोली है, वह क्या जाने
घर में ही रहती है एक बला.

गोस्ट की शैतानी के कारण
डांट पड़ी है मुझ को कई बार,
गोस्ट को आता खूब मज़ा
जब माँ से होती मेरी तकरार.

स्कूल बैग में रखा मेरा लंच
नन्हें गोस्ट को खूब लुभाता,
और स्कूल बुक्स से छेड़ाखानी
यही खेल है उसको आता.

एक दिन जब नोट बुक्स को
बकरी समान वह निगल गया,
उस दिन मेरे धीरज का बाँध
गुस्से में यूँ पिघल गया.

बंद किये सब खिड़की दरवाज़े
और बुझा दी हर इक लाइट,
अपने कुत्तों से फिर मैं बोला,
“शुरू करो तुम अपनी फाइट”

कमरे में था गहन अँधेरा
दोनों कुत्ते भौंक रहे थे,
नन्हें गोस्ट के नन्हें दाँत
डर से सभी खड़क रहे थे.

नन्हा गोस्ट तो कुत्तों से
रहता है हरदम भयभीत,
और गहन अँधेरे में उसकी
बढ़ जाती है हार्ट की बीट.

डर कर तब वह दौड़ा-भागा
आया झटपट मेरी ओर,
कान पकड़ कर खड़ा हो गया
सह न पाया इतना शोर.

“आज करता हूँ तुम से प्रॉमिस
पर पहले तुम लाइट जलाओ,
न करूंगा मैं तंग कभी
इन कुत्तों से मुझे बचाओ.”

मुझ को आई खूब हंसी
उसकी रोनी सूरत पर,
उसने किया था मुझे
हर दिन कितना तंग मगर.

पर जो चाहा वह कर पाया
उसको सही सबक सिखाया,
अच्छे से वह सदा रहे
मैंने था बस इतना चाहा.

मेरे कमरे में है लटकी
इक पुरानी ग्रैंडफादर क्लॉक,
नन्हा गोस्ट है रहता भीतर

अब न करता वह कोई टॉक.
© आइ बी अरोड़ा

Tuesday, 23 June 2015

दो यार

इक बन्दर और इक भालू में
होने लगी इक दिन तकरार
वैसे थे वो दोनों ही
एक दूसरे के पक्के यार

बन्दर बोला “तुम जैसा आलसी
मैंने देखा नहीं आज तक”
भालू बोला “तुम ही करते हो
हरदम इतनी ज़्यादा झकझक”

“भालू, तन के तो हो तुम भूरे
पर मन है पूरा काला”
“बन्दर, तुम कपटी हो कितने
यह है सबने देखा भाला.”

बन्दर तब गुस्से से चिल्लाया
“आज बचोगे न तुम खाओगे मार”
भालू भी आँख दिखा कर बोला
“अरे, मैं तो हूँ कब से तैयार”

दोनों को लड़ता देख
सभी को आया खूब मज़ा
उनकी शैतानी की उनको
मिलने वाली थी आज सज़ा.

दोनों ही थे दुष्ट बहुत
और परले दर्जे के शैतान
उन बदमाशों के कारण
हर कोई था खूब परेशान

पर आज सभी ने
था वन में अवसर पाया
सब ने ही मिलकर उन
दोनों को खूब उकसाया

दोनों हो गये आग बबूला
आगा पीछा दोनों ने भूला
एक दूसरे पर टूट पड़े
और लातें घूसें खूब झड़े

भालू का टूट गया इक दाँत
 बहने लगा खून नाक से
बन्दर का टूट गया इक हाथ
 बहने लगे आंसू आँख से.

हाथी ने किया बीच-बचाव
और दोनों को इक डांट लगाई
“हुआ क्या है मुझे बताओ और
बंद करो यह हाथा-पाई”

बन्दर और भालू दोनों 
खड़े हो गये मुंह लटका कर
किस बात पर थे वह झगड़े
याद न था यह उनको पर

हाथी को आया गुस्सा
और दोनों पर वह चिल्लाया
“जब बात न थी कोई लड़ने की 
लड़ कर तुम ने क्या पाया”

सब को उन पर आई हँसी
सब ने ही था उनको उकसाया
“दादा,अपनी शैतानी का फल
आज है इन दोनों ने पाया”

बन्दर और भालू दोनों
समझ गये गलती अपनी
“अब न करेंगे तंग किसी को
मन में यह हमने ठानी”
© आइ बी अरोड़ा


Thursday, 5 March 2015

होली आई




होली आई होली आई
ज़ोर से बोला भालू भाई
रंगों की पिचकारी लेकर
 लोमड़ी झटपट दौड़ी आई

बन्दर भी भागा भागा आया
मुंह अपने पर ही रंग लगाया
बन्दर पर थी मस्ती छाई
होली थी उसकी मन भायी

भालू ने हाथी पर रंग डाला
मुंह उसका नीला कर डाला
पर हाथी भी था न कोई कम
भालू को उसने पीला रंग डाला

लाल गुलाल और हल्का पीला
हरा बैंगनी और पक्का नीला
जिसने  भी जो रंग पाया
उसी रंग में सबको नहलाया

पर एक जानवर ऐसा भी था
जिसको कोई रंग न पाया 
छिप कर था वह बैठा घर में
 कोई उसे ढूंढ न पाया

वह तो था जंगल का राजा
रंगों से था वह पर डरता
होली पर वह छिप कर रहता
होली पर वह नाटक करता

लोमड़ी भी थी खूब चालाक
शेर को उसने ढूंढ निकाला
शेर छिपा था बिस्तर के नीचे
सबने उसको खींच निकाला

शेर बहुत ज़ोर से चिल्लाया
“बहुत बीमार हूँ मैं भाइया
रात भर मुझ को नींद न आई
 कुछ तो तरस करो तुम भाई”

कौन था पर उसकी सुनने वाला 
यह नाटक था देखा भाला
सब ने उस पर हर रंग डाला
और मुंह कर दिया थोड़ा काला

फिर सब मिलकर सुर में गाये
“साल में इक बार होली आये  
होली में जो भी छिप जाए
उसे तो बस भगवान बचाये



© आई बी अरोड़ा 

Sunday, 26 October 2014

दीवाली


ऊंचे पर्वत की चोटी से
सैनिक ने देखा चारों ओर,
मन में उसके गूंज रहा था
अपने दोनों बच्चों का शोर.

बच्चों ने कहा था बड़े प्यार से,  
“हम संग रहेंगे सब इस बार,
दीवाली मनाएंगे सब मिलकर  
मिल जाये खुशियों का अंबार. 

पिछली होली और दीवाली
हम सब थे बहुत उदास,

घर था कितना खाली-खाली

आप न थे हम सब के पास.

 पर अब ऐसा नहीं चलेगा
आप को कुछ तो करना होगा,
घर आना ही है अब की बार
विनती करते है बारंबार.”

पर सैनिक लौट न पाया
सीमा पर था संकट छाया,
बच्चों की जब टूटी आशा
उनका मन भर सा आया.

माँ थी उनकी बहुत सुजान 
पति पर था उसे अभिमान,  
बच्चों को उसने पास बिठाया
बड़े प्यार से फिर समझाया,  

“पिता तुम्हारे हैं सीमा पर
देश की रक्षा करते डटकर,
  सब करते उनका सम्मान   
उन पर करो तुम अभिमान.

 सैनिक रहते चौकस हर पल
उनका बलिदान न जाता निष्फल,
चैन से सो पाते हम हर रात
 सतर्क है हर सैनिक दिन रात.

खूब मनाओ तुम दीवाली
मन पर रखो न कोई भार,
मैं कहती हूं बिलकुल सच
पिता तुमसे करते बहुत प्यार.”

बच्चों ने किया खूब धूम धड़ाका
चलने लगे  फूलछड़ी पटाखा,
सीमा पर सैनिक मुसकाया
जीवन में क्या-क्या न पाया.

© आई बी अरोड़ा