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Wednesday, 23 March 2016

“नटखट नट्टू” (अंतिम भाग)
सब भैंसें गुस्से से शेर की ओर दौड़ीं. अब शेर का माथा ठनका. वह समझ गया कि भैंसों पर दहाड़ कर उसने भूल कर दी थी.
सामने गुस्से से भरी भैंसें थीं और पीछे मगरमच्छों से भरी नदी. उसे तैरना आता था, पर मगरमच्छों के कारण नदी के पार जाना आसान न था. मगरमच्छों ने एक साथ हमला कर दिया तो जान भी जा सकती थी.  
एक तरफ भैंसें थीं और दूसरी ओर मगरमच्छ. ऐसी स्थिति में भैंसों का सामना करने के अतिरिक्त उसके पास कोई रास्ता न था. शेर बहादुर था पर घमंडी भी था. उसने भैंसों से लड़ने का मन बना लिया.
नट्टू खरगोश नदी किनारे ही घास, पत्तियाँ खा रहा था. उसने भी शेर की दहाड़ सुनी थी. उसने भैसों के झुण्ड को शेर की ओर जाते देख लिया था. वह एक पल में समझ गया कि शेर पर आफत आने वाली थी.
‘श्रीमान, अब आप एक बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं. आपको इस मुसीबत से निकालने का कोई उपाये तो मुझे करना ही पड़ेगा, आपको वचन जो दे रखा है मैंने,’ नट्टू ने अपने आप से कहा.
नट्टू जानता था कि उसे तुरंत ही कुछ करना होगा. शेर शक्तिशाली था पर इतनी सारी भैंसों का अकेले सामना नहीं कर सकता था. अगर उसे देर तक भैंसों से लड़ना पड़ा तो उसकी जान भी जा सकती थी.
नट्टू ने नदी के किनारे रेत पर लेटे हुए मगरमच्छों को देखा. सब के सब आँखें बंद किये मज़े से धूप में सुस्ता रहे थे. मगरमच्छों को देख कर नट्टू के मन एक योजना आई.
नट्टू मगरमच्छों के निकट आया और चिल्ला कर बोला, ‘तुम सब के सब तो छिपकलियों की तरह सुस्त और मूर्ख हो. उठो सब यहाँ से और जाकर नदी में डुबकियां लगाओ. अब मैं यहाँ धूप में लेट कर थोड़ा आराम करूंगा. उठो, भागो.’
नट्टू की बात सुन कर मगरमच्छ दंग रह गये. जंगल का कोई भी प्राणी उनसे इस तरह बात नहीं करता था. सब जानते थे कि मगरमच्छों को छिपकली शब्द से ही चिढ़ थी. अगर कोई उन्हें  छिपकली कह कर बुलाता तो वह अपना आपा खो बैठते थे. गुस्से से वह कांपने लगते थे. और सब मिलकर चिढ़ाने वाले पर टूट पड़ते थे.
‘मित्रो, लगता है इस मूर्ख खरगोश को आजतक किसी न यह नहीं बताया कि बढ़ों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये. क्यों न आज हम इसे थोड़ी शिक्षा दें,’ एक मगरमच्छ ने कहा.
‘नहीं भाई, इस दुष्ट को शिक्षा देने की कोई आवश्यकता नहीं है. इसे तो पकड़ कर खा जाना चाहिये,’ दूसरे मगरमच्छ ने कहा.
‘पकड़ो इस बदमाश को,’ सब एक साथ चिल्लाये. सब एक साथ उस पर झपटे.
नट्टू भाग खड़ा हुआ. पर वह वैसे न भागा जैसे वह भागा करता था, आंधी सामान तेज़. वह भागा पर धीरे-धीरे भागा. उसने ऐसे दिखाया कि जैसे उसकी एक टाँग में चोट लगी थी. मगरमच्छों को लगा कि चोटिल खरगोश तेज़ न भाग पायेगा. अगर वह उसका पीछा करते रहे तो उसे पकड़ लेंगे.
नट्टू धीरे-धीरे भागता रहा और रुक-रुक कर मगरमच्छों को चिढ़ाता भी रहा. गुस्से से भरे मगरमच्छ उसके पीछे दौड़ते रहे.  नट्टू चालाकी के साथ उन्हें उस ओर ले आया जिस ओर भैंसों का झुण्ड था.
शेर की ओर बढ़ती भैंसों को अचानक मगरमच्छों की गंध आई. वह रुक गईं. उन्होंने देखा कि कई मगरमच्छ गुस्से से भरे उनकी ओर आ रहे थे. नट्टू अब झाड़ियों में छिप गया. भैंसों ने समझा कि सभी मगरमच्छ उन पर हमला करने आ रहे थे.
भैंसें असमंजस में पड़ गईं. शेर की ओर से उनका ध्यान हट गया. वह इस नई मुसीबत से बचने का उपाये सोचने लगीं. भैंसों को देख कर मगरमच्छ भी चौकने हो गये. झुण्ड बहुत बड़ा था और मगरमच्छ नदी से बहुत दूर आ चुके थे. ऐसी खुली जगह में भैंसों से लड़ना आसान न था. पर वह डरे नहीं और भैंसों की ओर देखते हुए डरावनी आवाजें निकालने लगे.
भैंसों का किसी से भी लड़ने का मन न था. वह तो मज़े से धीमे-धीमे चलते दक्षिण की ओर जा रहीं थीं. बस शेर की दहाड़ सुन कर थोड़ा गुस्सा हो गईं थीं.
भैंसें न शेर से लड़ीं, न मगरमच्छों से. सब अपने रास्ते चल दीं. मगरमच्छ भी झटपट नदी की ओर वापस चल दिए. शेर झाड़ियों में छिपा सब देख रहा था. झुण्ड के जाते ही उसने भी राहत की सांस ली.
‘श्रीमान, क्या मेरी योजना सफल रही?’ नट्टू ने पूछा. उसका प्रश्न सुनकर शेर को आश्चर्य हुआ. उसे पता ही न चला था कि नट्टू पास ही झाड़ियों में छिपा बैठा था. पर वह खरगोश की सूझबूझ से खूब प्रभावित हुआ था.
‘तुम्हारी चाल तो पूरी तरह सफल रही.’ शेर ने प्यार से उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा.
‘तो अब आप क्या सोचते हैं? क्या मुझ जैसा छोटा प्राणी आपके किसी काम आ सकता है या नहीं?’ नट्टू ने मुस्कुरा कर पूछा.
‘आज एक बात मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूँ, इस संसार में सबसे शक्तिशाली प्राणी को भी मित्रों की आवश्यकता पड़ सकती है. इसलिये सच्चा शक्तिशाली वही होता है जिसके कई मित्र होते हैं. आओ, आज से हम दोनों मित्र बन जाएँ.’
शेर और नटखट खरगोश मित्र बन गये.

Monday, 21 March 2016

“नटखट नट्टू” (भाग 1)
एक वन में एक खरगोश रहता था. नाम था नट्टू. था वह बहुत ही नटखट. वन के अन्य प्राणियों को सताने में उसे खूब आनंद आता था.
वन के बीचों-बीच एक नदी बहती थी. उस नदी में कई मगरमच्छ भी थे. बेचारे मगरमच्छों को तो नट्टू सबसे अधिक तंग किया करता था.
जब मगरमच्छ रेत पर लेट कर धूप सेंक रहे होते वह नदी किनारे आ जाता. उन्हें छेड़ता, उन्हें चिढ़ाता, उनका मज़ाक उड़ाता. नट्टू की शैतानियों से तंग आकर अगर कोई मगरमच्छ उसे पकड़ने के लिए उस पर झपटता तो वह आंधी समान वहां से भाग खड़ा होता.
मगरमच्छ नट्टू की भांति तेज़ न भाग पाता. वह उसे पकड़ न पाता और हार मन कर रुक जाता. तब नट्टू दूर खड़े हो कर उस मगरमच्छ पर खूब ज़ोर से हंसता, उसकी खिल्ली उडाता. बेचारा मगरमच्छ अपना-सा मुहं लेकर रह जाता. बस गुस्से से भरी आँखों से नट्टू को देखता, पर कुछ कर न पाता.
परन्तु एक दिन नटखट नट्टू बड़ी भूल कर बैठा. उस दिन नदी किनारे उसे कोई मगरमच्छ दिखाई न दिये. लेकिन उसे एक शेर दिखाई दिया. शेर पानी पीकर नदी से वापस लौट रहा था. नट्टू शेर का मज़ाक उड़ाने लगा.
शेर ने जब देखा कि एक छोटा सा खरगोश उसकी खिल्ली उड़ा रहा है तो गुस्से से आगबबुला हो गया. गुस्से से उसका शरीर तन गया और बाल खड़े हो गये.
आज तक किसी ने भी उसके साथ ऐसा अभद्र व्यवहार करने का साहस न किया था. जंगल के सब प्राणी उसका सम्मान करते थे. उससे डरते भी थे.
शेर का विकराल रूप देख कर नट्टू भयभीत हो गया. उसने वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी. परन्तु बिजली की फुर्ती से शेर नट्टू पर झपटा. एक पल में ही उसने नट्टू को पकड़ लिया.
नट्टू समझ गया कि अब उसकी जीवन लीला समाप्त होने वाली थी. डर कर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं. फिर एक ही पल में उसने अपने को संभाल भी लिया.
नट्टू चालाक था और शेर के चंगुल से बचने की चाल सोचने लगा. उसने बड़ी निडरता से कहा, ‘श्रीमान, मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गयी जो मैंने आपका मज़ाक उड़ाया. मुझे सच में बहुत पछतावा हो रहा है. मुझे ऐसा न करना चाहिये था. मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ. आप आप मुझ पर दया करें और मुझे छोड़ दें. आपका यह उपकार मैं कभी न भूलूंगा. अगर आप कभी किसी मुसीबत फंस गये तो मैं अवश्य आपकी सहायता करूंगा.’
नट्टू की बात सुन शेर आश्चर्यचकित हो गया.
‘तुम तो अजब प्राणी हो. तुम्हारे जैसा दु:साह्सी प्राणी तो मैंने आज तक नहीं देखा. तुम्हें लगता है कि कभी मुझे तुम जैसे तुच्छ प्राणी की सहायता लेनी पड़ सकती है? क्या तुम्हें लगता है कि मेरे जैसे शक्तिशाली पशु पर कभी कोई मुसीबत आ सकती है?’
‘श्रीमान, मैं जानता हूँ कि आप इस वन में सबसे शक्तिशाली हैं, आप बहुत चतुर भी हैं; पर यह संसार बहुत अनोखा है, यहाँ कभी भी और किसी पर भी कोई मुसीबत आ सकती है.’
‘अरे, मैं तो जानता न था कि तुम इतने बुद्धिमान हो. अच्छा यह बताओ कि अगर मैं कभी मुसीबत में फंस जाता हूँ तो तुम किस प्रकार मेरी सहायता करोगे?’ शेर ने पूछा.
‘आप पर आई मुसीबत को मैं ठीक से समझने का प्रयास करूंगा, सब समझ कर मैं यह तय करूंगा कि उस मुसीबत से छुटकारा पाने का सही तरीका क्या हो सकता है. फिर मैं वही करूंगा जिससे आप उस मुसीबत से बाहर आ पायें,’ नट्टू ने बड़े विश्वास से कहा.
शेर अपनी हंसी न रोक पाया. वह ज़ोर से हंसा, ‘तो तुम अपनी समझबूझ से मुझ पर आई मुसीबत से मुझे छुटकारा दिलाओगे. तुम्हारा विश्वास तो प्रशंसा करने योग्य है. चलो मैं तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार कर लेता हूँ. पर अगर मुसीबत के समय तुमने मेरी सहायता नहीं की तो मैं तुम्हें जीवित नहीं छोडूंगा.’
जैसे ही शेर ने अपना पंजा हटाया नट्टू जान बचा कर भाग खड़ा हुआ.
इस घटना के पाँच दिन के बाद की बात है. जंगली भैंसों का का बहुत बड़ा झुण्ड नदी किनारे उत्तर से दक्षिण की ओर जा रहा था. वह झुण्ड घास की तलाश में हर वर्ष दक्षिण की ओर जाता था.
भैंसों ने एक पेड़ के नीचे शेर को देखा. शेर नर्म-नर्म घास पर लेटा आराम कर रहा था. शेर ने भी सर उठा कर भैंसों को देखा. भैंसों को डराने के इरादे से वह ज़ोर से दहाड़ा. भैंसों को शेर का इस तरह, बिना किसी कारण, दहाड़ना अच्छा न लगा. उन्हें लगा कि शेर उनका अपमान कर रहा था.
‘इस शेर को थोड़ा सबक सिखाना पडेगा. हमने तो इसे ज़रा भी परेशान नहीं किया था. फिर यह हम पर इस तरह क्यों दहाड़ा?’ झुण्ड के नेता ने थोड़ा गुस्से से कहा.
‘इस घमंडी शेर को थोड़ा सबक सिखाना ही होगा, सिखाना ही होगा,’ कई भैंसे एक साथ बोलीं.


Tuesday, 7 April 2015

भद्दा मज़ाक
(अंतिम भाग) 
(कहानी का पहला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं)

"पीपल वाले बाबा कहीं चले तो नहीं गये?” खरगोश निराशा से बोला.

“उस बन्दर ने मूर्ख बनाया हैं हमें.” भालू ने गुस्से से कहा.

“वह ऐसा क्यों करेगा?” खरगोश ने कहा.

“दूसरों को सताना उसे अच्छा जो लगता है. पर हमारे साथ ऐसा भद्दा मज़ाक करके उसने अच्छा नहीं किया. मैं अभी उसके घर जाकर उसकी ऐसी धुनाई करूंगा कि  आज के बाद वह किसी के साथ भी मज़ाक न करेगा.” भालू बुरी तरह भड़क चुका था.

“अभी उसके घर जाकर हंगामा करना ठीक न होगा. सब जान जायेंगे कि उसकी बातों में आकर हम दोनों बुद्धू बन गये. सब हम पर हसेंगे,” खरगोश ने समझाते हुए कहा.

“वह तो सब हंसेगे ही; वो बन्दर स्वयं ही सबको यह बात बड़ा-चढ़ा कर बतायेगा,” भालू ने कहा और दनदनाता हुआ बन्दर के घर की ओर चल दिया. खरगोश भी भागा-भागा उसके पीछे आया.

चीपू बन्दर के घर के निकट पहुँच कर दोनों ठिठक कर खड़े हो गये. दोनों ने देखा कि दो जने बन्दर के घर में घुसने की कोशिश कर रहे थे.

“चोर हैं,” खरगोश ने फुसफुसा कर कहा.

“चीपू के घर में चोरी करने जा रहे हैं,” भालू ने भी फुसफुसा कर कहा.

“हमें कुछ करना होगा,” खरगोश बोला.

“हम कुछ न करेंगे. बस तमाशा देखेंगे,”भालू ने कहा.

“यह क्या कह रहे हो? आज इन चोरों ने अगर चीपू के घर चोरी की तो कल हमारे, तुम्हारे घर में भी चोरी कर सकते हैं. चीपू से हम अलग से निपट लेंगे, पर इन चोरों को हम नहीं छोड़ सकते,” खरगोश ने समझाया.

“तुम ठीक कह रहे हो,” भालू ने कहा.

“पुलिस बुलायें?”

“इतना समय नहीं है, हमें ही साहस से कुछ करना होगा.”

दोनों सावधानी के साथ आगे आये, और अचानक चोरों पर झपट पड़े. चोर हक्के-बक्के रह गये. एक चोर के पास एक चाकू भी था. पर, इससे पहले कि वह कुछ कर पाता, भालू ने दोनों चोरों को धर-दबौचा.

दोनों चोरों को पकड़ कर, भालू और खरगोश पुलिस स्टेशन ले आये. चोरों के देखते ही इंस्पेक्टर खुशी से उछल पड़ा, “अरे, आप लोगों ने तो कमाल कर दिया.”

उसने भालू और खरगोश की पीठ थपथपाई और कहा, “आप दोनों को सरकार की ओर से पचास हज़ार रूपए का पुरस्कार मिलेगा. और यह पुरस्कार वनराज स्वयं अपने हाथों से देंगे”

“क्यों-क्यों?” भालू और खरगोश एक साथ बोले.

“इन बदमाशों को पकड़ने के लिए, चार महीने पहले यह दोनों, एक सिपाही को घायल कर, जेल से भाग गये थे. तभी वनराज ने कहा था कि जो कोई भी इन बदमाशों को पकड़वायेगा उसे वह पुरस्कार देंगे.”

भालू और खरगोश प्रसन्नता से खिल उठे. भालू भी अपना गुस्सा भूल गया. तब खरगोश ने कहा, “मित्र, सुबह चीपू जी से भी मिलना है.”

सुबह होते ही दोनों चीपू के घर पहुँच गये. दोनों ने मुंह लटका रखे थे. उनको देख बन्दर मन ही मन बहुत खुश हुआ. उसने बड़े भोलेपन से कहा, “क्या बात है? इतनी सुबह कैसे आना हुआ?”

“एक बात बतानी थी, वनराज हमें पचास हज़ार का पुरस्कार देंगे,” खरगोश ने धीमे से कहा.

बन्दर कुछ समझ न पाया, पूछा, “क्यों?”

“सुबह तुम्हारे पीपल वाले बाबा ने हम दोनों के सिरों पर हाथ रखा और बस पुरस्कार की घोषणा हो गई,” भालू ने कहा.

“क्या मज़ाक कर रहे हो? कोई पीपल वाला बाबा नहीं है, वह तो मैंने बस तुम्हें बुद्धू बनाया था.” बन्दर ने कहा.

“हम भी तो तुम्हें बुद्धू ही बना रहे हैं,” इतना कह खरगोश खिलखिला कर हंस दिया.
फिर उसने सारी बात बताई. अब चीपू बन्दर पानी-पानी हो गया.

“मैंने तुम लोगों के साथ भद्दा मज़ाक किया पर तुम दोनों ने मुझे चोरों से बचाया.”

“अब ऐसा मज़ाक किसी के साथ न करना. अगर रात में चोर तुम्हारे घर चोरी करने की कोशिश न कर रहे होते तो तुम्हारी धुनाई हो जाती. अपने मित्र को मैंने कभी इतने गुस्से में न देखा था जितना गुस्सा उसे रात में आया था. तुम तो बाल-बाल बच गये.” खरगोश ने कहा.

“कभी दुबारा ऐसा मज़ाक तुम ने किया तो पिटने से न बच पाओगे,” इतना कह भालू खिलखिला कर हंस दिया.


© आई बी अरोड़ा

Monday, 6 April 2015

भद्दा मज़ाक
(भाग 1)
चीपू बन्दर को एक दिन एक शरारत सूझी. वह भालू के घर आया. खरगोश भी वहीं था. दोनों को एक साथ देख बन्दर मन ही मन मुस्कुराया और बोला, “अगले सोमवार वनराज का जन्मदिन है. उस दिन वनराज वन के दस बुद्धिमान पशूओं का सम्मान करेंगे और उन्हें पुरस्कार देंगें.”

“क्या पुरस्कार मिलेगा?” भालू ने पूछा.

“किन पशूओं को पुरस्कार मिलेगा?” खरगोश ने पूछा.

“यह मैं नहीं बता सकता, पर मैं इतना बता सकता हूँ कि सम्मान और पुरस्कार पाने वालों में मेरा नाम भी होगा.”

“हम तुम्हारे मित्र हैं. हमें तो बता सकते हो,” खरगोश ने कहा. वनराज से सम्मान और पुरस्कार पाने की इच्छा उसके मन में जाग उठी थी.

“यह सारी जानकारी अभी पूरी तरह गुप्त है. परन्तु पीपल वाले बाबा ने मुझे सब बता दिया है,” बन्दर ने ऐंठते हुए कहा.

“पीपल वाला बाबा? वह कौन है?” भालू ने नाक चढ़ा कर पूछा.

“पीली नदी के पास जो पुराना पीपल है वहां एक बाबा आजकल आये हुए हैं. सब उन्हें पीपल वाला बाबा कह कर बुलाते हैं. मैं कल उनके दर्शन करने गया था. उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा कि  शीघ्र ही वनराज मुझे सम्मान और पुरस्कार देंगे,” बन्दर गर्व के साथ बोला.

“अरे, यह बाबा लोग सब ढोंगी होते हैं. तुम तो इतने चालाक हो, तुम उनके चक्कर में कैसे पड़ गये?” भालू ने बन्दर का मज़ाक उड़ाते हुए कहा.

“पीपल वाले बाबा ऐसे-वैसे बाबा नहीं हैं, जिसके भी सिर पर हाथ रख देते हैं उसका भाग्य पलट जाता है.” बन्दर ने अकड़ते हुए कहा.

“अगर बाबा मेरे सिर पर हाथ रखेंगे तो क्या मेरा भाग्य भी पलट जायेगा?” खरगोश ने उत्सुकता से पूछा.

“हां, अवश्य पलट जायेगा.” बन्दर ने पूरे विश्वास से कहा.

“मित्र, हम भी बाबा के दर्शन करने चलें?” खरगोश ने भालू से पूछा.

“मैं इन बातों में विश्वास नहीं करता,” भालू ने कहा.

“एक बात जान लो, बाबा सुबह तीन और चार के बीच ही दर्शन देतें हैं. देर से जाओगे तो खाली हाथ लौटना पड़ेगा. और एक-दो दिनों में वह यहां से जा भी रहे हैं,” इतना कह चीपू बन्दर वहां से चल दिया.

उसके जाते ही खरगोश ने भालू से कहा, “ मुझे पीपल वाले बाबा के दर्शन करने ही हैं और वह भी कल सुबह. तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो तुम्हें मेरे साथ चलना होगा. मैं कल सुबह तीन बजे तुम्हारे घर पहुंच जाऊंगा. तुम मेरे साथ चलना.”  
भालू मना न कर पाया और खरगोश की बात मान गया.

खरगोश तो रात भर सो भी न पाया. तीन बजते ही उसने भालू के घर का दरवाज़ा खटखटा दिया. भालू तो गहरी नींद सो रहा था. आवाज़ सुन कर वह हड़बड़ा कर उठ बैठा. दरवाज़े के बाहर खरगोश के देख कर वह गुस्से से चिल्लाया, “इस समय दरवाज़ा क्यों पीट रहे हो? क्या हुआ है?”

“अरे, भूल गये? हमें पीपल वाले बाबा के दर्शन करने जाना है,” खरगोश ने धीमे से कहा.

“लगता है उस पाजी बन्दर ने तुम्हारा दिमाग़ ख़राब कर दिया है.”भालू ने कहा.

भालू को गुस्सा तो बहुत आ रहा था परन्तु खरगोश के साथ चलने के लिए वह तैयार हो गया. दोनों नदी की ओर चल दिये. चारों ओर घुप अँधेरा था. खरगोश को डर लग रहा था. भालू निडर था. उसे खरगोश पर तरस आया और उसने कहा, “ डरो मत, मैं साथ हूँ.”

नदी किनारे पीपल का एक पेड़ तो था, परन्तु वहां न तो कोई बाबा था और न ही बाबा के दर्शन करने आये लोग.
© आई बी अरोड़ा


Wednesday, 6 August 2014

धूर्त की मित्रता
एक सियार बूढ़ा हो चला था. भोजन जुटाना उसके लिए कठिन हो गया था. कभी-कभी तो उसे भूखा ही रहना पड़ता था.
सियार का शरीर तो कमज़ोर हो रहा था, परन्तु अभी भी उसका दिमाग खूब तेज़ था. दूसरों को फांसने की नई-नई चालें हर समय वह सोचता रहता था. सब जानते थे कि सियार बहुत चालाक है, सब उससे सावधान रहते थे.
एक दिन सियार ने नदी किनारे खरगोशों का एक जोड़ा देखा. खरगोशों को  देख कर उसकी आँखें चमकने लगीं. उसने मन ही मन कहा, “इनको पहले कभी नहीं देखा. शायद किसी दूसरे वन से आकर यहाँ बस गयें हैं. इन्हें चकमा देना सरल होगा. अगर यह दोनों मेरे हाथ लग जाएँ तो मज़ा आ जाये.”
अगले दिन सियार एक पेड़ के नीचे आ कर बैठ गया. खरगोश उस पेड़ के निकट ही रहते थे. सियार को देख कर दोनों डर गये. परन्तु सियार ने उनकी ओर देखा भी नहीं. वह तो अपनी आँखें बंद कर के बैठ गया, जैसे किसी सोच में हो.
बैठे-बैठे सियार बड़बड़ाने लगा, “मैं भी कैसा मूर्ख हूँ, ढेर सारी गाजरें ले आया. गाजरें बहुत स्वादिष्ट हैं, पर मैं तो गाजरें खाता नहीं. लगता है शरीर के साथ मेरा दिमाग भी कमज़ोर होता जा रहा है.”
सियार इतनी ज़ोर से बड़बड़ा रहा था कि खरगोशों ने सब सुन लिया. उन्हें गाजरें बहुत अच्छी लगतीं थीं. उनके मुंह में पानी आ गया.
एक खरगोश ने दूसरे से कहा, “तुम ने सुना, सियार क्या बड़बड़ा रहा था?”
दूसरा खरगोश बोला, “कुछ गड़बड़ है. यह सियार गाजरें क्यों लाएगा? इस सियार से दूर ही रहना. इसकी बातों में न आना.”
“तुम्हें तो हर बात में गड़बड़ दिखाई देती है. मुझे तो यह बूढ़ा सियार सीधा-साधा प्राणी लगता है. हमें इससे मित्रता कर लेनी चाहिये.”
“इस धूर्त सियार से मित्रता करोगे तो पछताओगे.”
“हम अभी-अभी इस वन में आये हैं. सबसे जान पहचान भी नहीं हुई और तुम कह रही हो कि यह सियार धूर्त है,” खरगोश ने झिड़कते हुए अपनी पत्नी से कहा.
खरगोश ने पत्नी की एक न सुनी और सियार से मित्रता करने चल दिया.
“नमस्ते बाबा, मेरा नाम टिकमा खरगोश है. हम इस वन में नये-नये आये हैं. निकट ही हमारा घर है. आप कहाँ रहते हैं?”
सियार मन ही मन मुस्कराया. वह जानता था कि खरगोश उसकी चाल में फंस गया है. अपनी प्रसन्नता छिपाते हुए उसने कहा, “बेटा, मैं तुम्हारा पड़ोसी हूँ. बूढ़ा हूँ. बिलकुल अकेला हूँ. बहुत दुःखी हूँ.”
“आप दुःखी क्यों हैं?”
“इस वन में न कोई मुझ बूढ़े से बात करता. न कोई मेरे घर आता. न कोई मुझे अपने घर बुलाता.” 
“बाबा, हम आपको अपने घर बुलायेंगे और हम आपके घर भी आयेंगे.”
“तुम आओगे मेरे घर? अवश्य आना, आज ही आना. अपनी पत्नी को भी साथ लाना. मैं तुम्हें गाजरें खिलाऊंगा. ऐसी मीठी गाजरें तुम ने आज तक ना खाई होंगी,” सियार ने प्रसन्नता से कहा.
टिकमा यही तो चाहता था. झट से बोला, “हम आज ही आप के घर आयेंगे.”
लौट कर उसने टिकमी को सारी बात बताई.
“मैं सियार के घर कभी न जाऊंगी. और मेरी मानो तो तुम भी न जाओ,” टिकमी ने कहा.
टिकमा अकेला ही सियार के घर आया. उसे अकेला देख सियार थोड़ा निराश हुआ. वह मन ही मन बोला, “सोचा था दोनों इकट्ठे ही फंस जायेंगे. चलो, आज एक को खा कर पेट भर लूंगा.”
जैसे ही खरगोश सियार के घर की भीतर आया सियार ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर, ताला लगा दिया. खरगोश को आश्चर्य हुआ. उसने पूछा, “दरवाज़े पर ताला क्यों लगाया?”
“वह इसलिये कि जब मैं तुम्हें भून कर खाऊं तो कोई मुझे यहाँ आकर तंग न करे.” इतना कह सियार ज़ोर से हंसा.
टिकमा के होश उड़ गये. मन ही मन उसने अपने आप से कहा, “ टिकमी ठीक कहती थी. यह सियार तो बड़ा धूर्त है. गाजरों का लालच दी कर इसने मुझे फांस लिया है. अब मुझे कोई नहीं बचा सकता.”
तभी किसी ने ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया. सियार हक्का बक्का रह गया. उसने सोचा भी न था कि इस समय कोई उसके घर आ जायेगा. टिकमा को पकड़ कर उसने एक संदूक में बंद कर दिया. फिर उसने दरवाज़ा खोला. बाहर शंकर हाथी और टिकमी थे. सियार की सिट्टी पिट्टी गम हो गई. वह शंकर हाथी से बहुत डरता था.
“टिकमा कहाँ है?” शंकर गरजा.
“यहाँ नहीं है,” सियार ने धीमे से कहा.
हाथी ने सियार को एक ओर धकेल दिया और घर के भीतर आ गया. उसने सब जगह ढूंढा पर टिकमा कहीं न मिला. तभी टिकमी ने देखा कि एक संदूक से एक शर्ट का कोना बाहर लटक रहा है. ऐसी ही शर्ट टिकमा ने पहन रखी थी. उसने शंकर को बताया. शंकर ने संदूक खोला. टिकमा संदूक के अंदर था. टिकमा को संदूक में बंद करते समय सियार ने जल्दी में ध्यान ही न दिया था कि उसके शर्ट का एक कोना संदूक के बाहर ही लटक रहा था. इतनी सी भूल के कारण वह पकड़ा गया.
शंकर हाथी ने गरज कर सियार से कहा, “तुम सुधरने वाले नहीं हो. तुम्हारा भलाई इसी में है कि तुम इस वन को छोड़ कर कहीं ओर चले जाओ. आज अगर मुझे गुस्सा आ गया तो तुम्हारी जान भी जा सकती है.”
“दादा, इस बुढ़ापे में मैं कहाँ जाऊंगा. मुझ पर दया करो और मुझे यहीं रहने दो. अब मैं किसी को तंग न करूंगा, मैं वचन देता हूँ,” सियार ने रोते-रोते कहा.
“आंसू बहाने से कुछ न होगा. सब तुम्हारी मक्कारियों से तंग आ चुके हैं. भागते हो या करूं तुम्हारी ठुकाई,” शंकर ने डांटते हुए कहा.
शंकर का गुस्सा देख सियार समझ गया कि जान बचा कर भागने में ही अब उसके भलाई है. वह दुम दबा कर भाग निकला. टिकमा और टिकमी खिलखिला कर हंस दिए.
टिकमी ने कहा, “अगर शंकर दादा संयोगवश इसी समय हम से मिलने न आते तो आज तुम बच न पाते. जब मैंने इन्हें बताया कि तुम सियार के घर गये हो तो यह समझ गये कि तुम सियार की चाल में फंस गये हो. और तुरंत तुम्हारी सहायता करने इधर आ गये.”
टिकमा ने हाथ जोड़ कर शंकर हाथी को नमस्कार किया और उन्हें धन्यवाद दिया.
शंकर ने टिकमा से कहा, “ मित्र अवश्य बनाओ, पर ज़रा सोच-समझ कर. धूर्त की मित्रता में सदा हानि ही होती है.”

© आई बी अरोड़ा 

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