Wednesday, 24 February 2016

दादी की सलाह (भाग 1)
रजत के पिता एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे. हर दो तीन वर्षों में उनकी बदली एक नगर से दूसरे नगर हो जाती थी. जब भी उनकी बदली होती वो अपना सारा सामान बाँध कर रेल या बस से नई जगह आ जाते थे.
रजत को नए स्कूल में प्रवेश लेना पड़ता था. नये नगर और नये स्कूल में उसके नये मित्र बनते थे. पुराने मित्रों से नाता टूट जाता था.
नई जगह आकर उसका मन न लगता था. पर धीरे-धीरे उसे अपना नया स्कूल और अपने नये मित्र अच्छे लगने लगते थे.
जब वह आठवीं कक्षा में पढ़ता था तब उसके पिता की बदली पांडवपुर हो गई. पांडवपुर एक छोटा-सा नगर था. वहां आकर पिता ने उसे एक सरकारी स्कूल में प्रवेश दिला दिया. कुछ ही दिनों में स्कूल में छुट्टियां पड़ गईं.
घर के आस-पास जितने भी लड़के थे उनका चाल-चलन कुछ अच्छा न था. यह बात रजत की दादी पहले दिन ही जान गई थी. उसने रजत को समझाते हुए कहा, ‘यहाँ के लड़कों के साथ मित्रता करने में जल्दी न करना. मुझे इन लड़कों का चाल-चलन कुछ ठीक नहीं लगता. तुम्हें थोड़ा सावधान  रहना पड़ेगा.’
‘दादी, स्कूल में भी मेरा कोई मित्र नहीं बना. अगर मैं आस-पड़ोस के बच्चों के साथ मित्रता नहीं करता तो मेरा कोई मित्र न होगा.’
दादी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘अगर अच्छे मित्र न मिलें तो अकेले रहना ही उचित है. जिन लड़कों का चरित्र अच्छा नहीं उनके साथ मित्रता करके कभी भलाई न होगी. उल्टा कभी मुसीबत में ही पड़ जाओगे.’
रजत ने दादी की बात कुछ दिन अपने मन में रखी. लेकिन  अकेले रहना उसे अच्छा न लगता था. उसका दिल चाहता था कि उसके बहुत सारे मित्र हों. वो मित्रों के साथ खेले, पतंग उड़ाये, इधर-उधर घूमे. परन्तु उसे तो सारा समय घर पर ही बिताना पड़ता था.
उसके पिता अपने काम में व्यस्त रहते थे. माँ घर के काम-काज में लगी रहती थी. बस दादी थी जो उससे गपशप करती थी या कभी-कभार लूडो खेल लेटी थी. पर वो भी अपना अधिक समय पूजा-पाठ में लगाती थी.
कुछ दिनों के बाद दादी की बात भुला कर उसने अड़ोस-पड़ोस के लड़कों से मित्रता कर ली. उन लड़कों के साथ वह क्रिकेट या गिल्ली-डंडा खेलता. कभी-कभी उनके साथ घूमने चला जाता.
एक दिन दादी ने पूछा, ‘क्या बात है? आजकल तुम सारा दिन घर से बाहर रहते हो? कहीं तुमने इन शरारती बच्चों के साथ दोस्ती तो नहीं कर ली?’
‘दादी, यह लड़के वैसे नहीं हैं जैसा आप समझती हो.’
‘मेरी बात मानो और इन सब से थोड़ा दूर ही रहो.’
‘मेरा इन से कोई मेलजोल नहीं है, बस कभी-कभार इनके साथ क्रिकेट खेल लेता हूँ.’
‘मैंने मना किया था.’
‘अरे दादी, आप यूँही चिंता करती हैं. अच्छा, मैं उनसे दूर ही रहूँगा.’
परन्तु रजत ने ऐसा किया नहीं. धीरे-धीरे उसने उन लड़कों के साथ खूब मेलजोल बढ़ा  लिया.
एक दिन रजत अपने मित्रों के साथ घूम रहा था. एक मित्र ने कहा, ‘क्यों न हम कल परेड ग्राउंड जा कर क्रिकेट खेलें? गली में खेलने में मज़ा ही नहीं आता.’
‘क्या यहाँ कोई परेड ग्राउंड भी है?’ रजत ने पूछा.
‘कई साल पहले यहाँ एक राजा साहिब हुआ करते थे. उनके महल के पीछे एक ग्राउंड थी जहां उनकी सेना परेड किया करती थी. अब न राजा साहिब हैं, न उनकी सेना. सब लोग उस ग्राउंड में मौज-मस्ती करते हैं, लड़के दिनभर खेलते रहते है.’
‘कहाँ हैं यह परेड ग्राउंड?’
‘बहुत दूर, नगर के दूसरी ओर. साइकिलों पर जाना पड़ेगा.’
‘मेरे पास तो साइकिल है नहीं,’ रजत ने कहा.
‘तुम अपना क्रिकेट का सामान ले आना, हम साइकिल ले आयेंगे.’ दूसरे मित्र ने कहा.
‘कहां से? कैसे?’
‘साइकिल किराये पर ले लेंगे.’ तीसरे ने बताया.
अगले दिन उसके मित्र तीन साइकिलें लिए आ गये. रजत भी तैयार था. सभी साइकिलों पर सवार हो कर परेड ग्राउंड की ओर चल दिए.

पैड बांधे रजत बल्ले बाज़ी कर रहा था कि अचानक उसके मित्र भाग खड़े हुए. रजत कुछ समझ न पाया और भौंचक्का सा चुपचाप खड़ा रहा.
(कहानी का अंतिम भाग अगले अंक में पढ़ें) 

Monday, 22 February 2016

वनदेवी का क्रोध
एक समय की बात है. अचरज वन में बुद्धिमान सिंह राज करता था. वह जंगल के सब पशुओं से प्यार करता था. हर पशु का पूरा ध्यान रखता था. सारे पशु भी शेर का बहुत सम्मान करते थे.
अचानक एक दिन बुद्धिमान सिंह बीमार हो गया. सब ने उसकी खूब सेवा की, पर उसे बचा न पाये. उसकी मृत्यु हो गई.
सब को बहुत दुःख हुआ. परन्तु चिंता का विषय यह था कि राजा किसे बनाया जाये.
बुद्धिमान सिंह का एक बेटा था, नाम था घुम्मकड़ सिंह. उसे घूमना-फिरना बहुत अच्छा लगता था. जिस समय उसके पिता की मृत्यु हुई उस समय भी वह कहीं सैर-सपाटा करने गया हुआ था. उसे गये हुए तीन माह हो चुके थे. कोई न जानता था कि वह कहाँ था और कब लौट कर आयेगा.
पशुओं ने एक सभा बुलाई. हाथी ने सब से कहा, ‘जंगल के कानून के अनुसार तो घुम्मकड़ को ही राजा बनाना चाहिये. परन्तु कोई नहीं जानता कि वह कहाँ है. ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिये?’
सियार ने झट से कहा, ‘हाथी को ही राजा बना दिया जाये. वह सब से समझदार है, सबसे शक्तिशाली है.’
लोमड़ ने तुरंत सियार की बात का समर्थन किया.
वह दोनों धूर्त थे. वह जानते थे कि हाथी सीधा-साधा पशु था.  अगर वह राजा बन गया तो वह दोनों उसके भोलेपन का लाभ उठा कर खूब मनमानी कर सकते थे.
भालू ने कहा, ‘हम कानून नहीं तोड़ सकते. किसी शेर को ही जंगल का राजा बनाया जा सकता है. हाथी को राजा बनाना गलत होगा.’
सियार ने कहा, ‘आप बिलकुल सही कह रहे हैं. हमें कानून नहीं तोड़ना चाहिये. पर जब तक घुम्मकड़ सिंह लौट नहीं आता तब तक किसी न किसी को तो राजपाट चलाना ही होगा.’
लोमड़ ने कहा, ‘राजा के बिना अगर कोई गड़बड़ हो गई तो हम सब क्या करेंगे?’
गैंडे ने कहा, ‘राजा तो होना ही चाहिये. तभी तो सब पशु कानून का पालन करंगे.’
भेड़िये ने कहा, ‘चुनाव कर लेते हैं, अब तो कई वनों में चुनाव से ही राजा चुना जाता है.’
सियार और लोमड़ एक साथ बोले, ‘हमारा प्रस्ताव है कि हाथी को इस वन राजा बनाया जाये. जो पशु इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं वह अपना हाथ उठायें.’
उनकी बात सुन कर सब पशु एक-दूसरे की ओर देखने लगे. लोमड़ और सियार को छोड़ किसी ने अपना हाथ न उठाया.
फिर दो-चार पशुओं ने अपने-अपने हाथ उठा दिए. उनको देख कर कुछ और पशुओं ने भी हाथ उठा दिए. देखते ही देखते लगभग सबने हाथ उठा दिए.
सियार ने खुशी से चिल्ला कर कहा, ‘सबके समर्थन से हाथी को इस वन का राजा बना दिया जाता है.’
हाथी जंगल का राजा बन गया.
सियार और लोमड़ अपनी चतुराई पर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए. दोनों हाथी के आस-पास ही मंडराने लगे. अवसर मिलते ही उसकी चापलूसी करते. अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से हाथी का मन मोह लेने की कोशिश करते.
हाथी सीधा-साधा तो था पर मूर्ख नहीं था. वो जानता था कि सियार और लोमड़ धूर्त थे. दोनों उसका मन जीत कर जंगल पर अपना दबदबा बनाना चाहते थे. हाथी ने भालू से इस विषय में बात की. भालू ने कहा, ‘सियार और लोमड़ थोड़े चालाक हैं पर इतने बुरे पशु नहीं हैं.’
‘अरे, अवसर मिलते ही यह सब पर अपनी मनमानी करने लगेंगे. तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा क्या? तो मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं कुछ समय के लिए ऐसा व्यवहार करूंगा कि जैसे मैं इनकी बातों में आ गया हूँ. मेरे ऐसा दिखाते ही दोनों का व्यवहार बदल जायेगा. बस तुम दोनों पर होशियारी से अपनी नज़र रखना.’
वैसा ही हुआ जैसा हाथी ने सोचा था. जब सियार और लोमड़ को लगा कि हाथी उन पर विश्वास करने लगा था तो दोनों अन्य पशुओं के साथ बुरा व्यवहार करने लगे. किसी की पिटाई कर देते, किसी से कोई वस्तु छीन लेते, किसी को धमकाते कि वनराज से उसकी झूठी शिकायत कर देंगे.
सब जानते थे कि हाथी की सियार और लोमड़ से अच्छी मित्रता थी, इसलिये कोई भी उन दुष्टों की शिकायत करने का साहस न कर पाया.
भालू सब देख. उसने हाथी को सारी बात बता दी.
‘मैंने कहा था न कि यह दोनों धूर्त हैं. अब मैं इन्हें ऐसा सबक सिखाउंगा कि यह दोनों इस वन से ही भाग जायेंगे,’ हाथी ने थोड़ा गुस्से से कहा.
अगले दिन जब सियार और लोमड़ हाथी से मिलने आये तो हाथी ने कहा, ‘अरे तुम दोनों का क्या होगा?’
दोनों थोड़ा घबरा गये. सियार ने पूछा, ‘क्या हुआ महाराज, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’
‘कल रात वनदेवी मेरे सपने में आईं. बहुत गुस्से में थीं, बोलीं कि मैंने राजा बन कर जंगल का कानून तोड़ दिया है. इस कारण मेरे सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे. मैंने कहा कि मैं अपनी इच्छा से राजा नहीं बना. मुझे तो सियार और लोमड़ ने ज़बरदस्ती राजा बना दिया है. इस पर वनदेवी ने कहा कि जिसने भी हाथी को राजा बनाया है उसके सिर के टुकड़े हो जायेंगे.’
सियार और लोमड़ के होश उड़ गये. सियार ने कहा, ‘आप तो सब के समर्थन से राजा बने. सब चाहते थे कि आप राजा बने.’
‘मैंने भी यही बात वनदेवी से कही थी. वह बोलीं कि प्रस्ताव किसने रखा था. मुझे बताना पड़ा कि प्रस्ताव तो तुम दोनों ने ही रखा था. बस, वनदेवी ने गुस्से में कह दिया कि जिसने भी मुझे राजा बनाने का प्रस्ताव रखा था उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे.’
हाथी की बात सुन सियार और लोमड़ की डर से घिग्घी बंद हो गई.
‘अब हमारा क्या होगा?’ सियार ने कहा.
‘मुझे भी तुम्हारी बहुत चिंता हुई. मैंने वनदेवी से कहा कि तुम दोनों को क्षमा कर दे.’ हाथी ने कहा.
‘वनदेवी ने क्या कहा?’ लोमड़ ने पूछा.
‘वनदेवी तो बहुत गुस्सा थीं. पर मैंने भी बार-बार विनती की तो बोली, “अगर वह दोनों घुम्मकड़ सिंह को ढूंढॅ कर ले आते हैं और उसे जंगल का राजा बना देते हैं तो मैं उनको क्षमा कर दूंगी.” मैंने वनदेवी से तुरंत कह दिया कि तुम दोनों घुम्मकड़ सिंह को अवश्य ढूंढॅ कर ले आओगे’
हाथी कि बात सुन सियार और लोमड़ की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई.
‘महाराज, कोई नहीं जानता कि घुम्मकड़ सिंह कहाँ गये हैं. हम उन्हें ढूँढने कहाँ जाएँ,’ सियार ने कहा.
‘अब मैं क्या बताऊं, वनदेवी ने कहा है कि अगर तुम आज सूर्य अस्त होने से पहले घुम्मकड़ सिंह  को खोजने नहीं गये तो तुम दोनों के सिरों के टुकड़े हो जायेंगे. मेरी मानो तो तुम दोनों अभी निकल पड़ो नहीं तो तुम्हारा अंत निश्चित है.’
सियार ने लोमड़ की ओर देखते हुए कहा, ‘भइया, निकल चलो. अगर घुम्मकड़ सिंह नहीं मिले तो किसी दूसरे वन में आसरा ढूंढने की कोशिश करेंगे.’
उनके जाते ही भालू ने हाथी से पूछा, ‘क्या सच मैं वनदेवी सपने में आई थीं?’
‘अरे नहीं, मैं जानता था कि यह दोनों बड़े अन्धविश्वासी हैं. बस इसी बात का लाभ उठा कर इन्हें एक मनगढंत कहानी सुना दी और देखो, दोनों दुष्टों से हम सब को छुटकारा मिल गया.’

‘इन दुष्टों ने सब की नाक में दम कर रखा था. इन के साथ ऐसा ही व्यवहार करना उचित था.’
© आइ बी अरोड़ा 

Monday, 15 February 2016

निगरानी
भालू पुलिस स्टेशन आया. उसे देख इंस्पेक्टर ने पूछा, “ कैसे आना हुआ? सब ठीक तो है?”

भालू कुछ कहने वाला ही था कि एक सिपाही सियार को गर्दन से पकड़ कर इंस्पेक्टर के पास ले आया.

सियार को देख इंस्पेक्टर भड़क गया. गुस्से से बोला, “ तुम कब सुधरोगे? जेल से छूटे अभी चार दिन भी नहीं हुए और बदमाशी करने लगे.”

“मैंने कुछ नहीं किया. आपका यह सिपाही मुझ से पैसे मांग रहा था. मैंने मना कर दिया तो मुझे पकड़ कर ले आया,” सियार ने अकड़ कर कहा.

“साहब, यह एक बड़ा-सा चाकू लिए बाज़ार में घूम रहा था,” सिपाही ने चाक़ू दिखाते हुए कहा.

“यह झूठ बोल रहा है, यह चाक़ू मेरा नहीं है,” सियार चिल्लाया.

वहां दीवार के पास खड़े हो जाओ, तुम से मैं बाद में निपटूंगा,इतना कह इंस्पेक्टर ने भालू से पूछा, “आप कुछ कह रहे थे?”

“हम लोग एक सप्ताह के लिए अचरज वन जा रहे हैं. आप अपने सिपाही से कह दें कि मेरे घर पर निगरानी रखे.”

“अच्छा किया आपने मुझे बता दिया. आप निश्चिंत रहें. बस, जाते समय सारे दरवाज़े, खिड़कियाँ ठीक से अवश्य बंद कर देना.”

“वह तो मैं स्वयं करूंगा. सोचता हूँ सारे गहने और रूपए एक तिजौरी में बंद कर अपने बड़े ट्रंक में रख दूँ और ट्रंक को एक बड़ा सा ताला लगा दूँ.”

“अरे, आप इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं, हम हैं न घर की निगरानी करने के लिए.”

“आप ठीक कहते हैं पर मैं तिजौरी को ऐसे बाहर छोड़ के नहीं जा सकता.” इतना कह भालू लौट गया.

भालू की जाते ही इंस्पेक्टर ने सियार की ओर गुस्से से देखा. सियार ने हाथ जोड़ कर इंस्पेक्टर से क्षमा मांगी और कहा कि वह कभी भी, कोई भी गलत काम नहीं करेगा. इंस्पेक्टर ने उसे चेतावनी दे कर जाने दिया.

सियार भागा-भागा लोमड़ के पास आया और बोला, “बॉस, ऐसी खबर लाया हूँ कि सुन कर उछल पड़ोगे.”

“क्या पेड़ों पर पैसे उगने लगे?” लोमड़ ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा.

“भालू एक सप्ताह के लिये अचरज वन जा रहा है. उसके जाते ही हम उसके घर में चोरी करेंगे और उसकी तिजौरी में रखा सारा माल चुरा लेंगे.”   

सियार ने यह न बताया कि भालू ने पुलिस इंस्पेक्टर से कहा था कि उसके घर पर निगरानी रखे.

लोमड़ बहुत खुश हुआ और दोनों ने एक योजना बना ली. जिस रात भालू अचरज वन गया उस रात दोनों चोर भालू के घर के निकट छिप गये. उस रास्ते पर एक पुलिस का सिपाही बीच-बीच में चक्कर लगा रहा था. सियार ने उसकी ओर संकेत किया तो लोमड़ ने भी संकेत कर कहा कि कोई चिंता की बात नहीं.

रात एक बजे भालू के घर के निकट सड़क किनारे खड़ी एक कार में आग लग गई. यह लोमड़ की योजना थी. उस समय पुलिस वाला निकट ही था. वह गाड़ी की ओर भागा और आग बुझाने की कोशिश करने लगा.

सियार और लोमड़ इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे. वह झटपट भालू के घर में घुस गये. भीतर जाकर सियार वह ट्रंक खोजने लगा जिसमे भालू ने अपनी तिजौरी रखी थी.

“तुम्हें कैसे पता कि तिजौरी ट्रंक के अंदर है?” लोमड़ ने फुसफुसा कर पूछा.

“मुझे सब मालूम है, बस तुम चुपचाप खड़े रहो,” सियार ने अकड़ कर कहा. उसने लोमड़ को जानबूझ कर सारी बात न बताई थी.

ट्रंक मिलते ही सियार ने उस पर लगा ताला खोल दिया. ताले खोलने में वह बहुत माहिर था.

ट्रंक के अंदर एक तिजौरी थी. सियार झटपट तिजौरी खोलने लगा, पर तिजौरी खुली ही नहीं.

“इसे ही ले चलते हैं,” लोमड़ ने कहा.

“नहीं, अगर सिपाही आ गया तो इसे कैसे छिपाएंगे?” सियार ने कहा.

“वह तो आग बुझाने में व्यस्त है,” लोमड़ बोला.

“फिर भी हम कोई जोखिम नहीं उठा सकते. धीरज रखो, अभी तिजौरी खुल जायेगी,” सियार ने कहा. तभी तिजौरी खुल गई.

“जल्दी सारा माल निकालो,” लोमड़ ने कहा.

सियार ने तिजौरी में हाथ डाला.

पर यह क्या? भीतर तो कुछ भी नहीं था. सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा था. कागज़ के टुकड़े को सियार के हाथ से छीन कर लोमड़ पढ़ने लगा. उस पर लिखा था, ‘तुम्हारी मेहनत बेकार गई, इस बात का मुझे बड़ा खेद है. मैंने सारे गहने और रूपए कहीं ओर छिपा कर रख दिए हैं. ढूँढने का प्रयास भी न करना. अब समय नष्ट न करो और भागो. पुलिस आती ही होगी-- तुम्हारा शुभचिंतक भालू.’

गुस्से से लोमड़ की आँखें लाल हो गयीं. सियार डर गया. बोला, “मुझे क्या पता था कि भालू इतना धूर्त है. चलो निकल चलो यहाँ से, कहीं पुलिस न आ जाये.”

“उस गाड़ी पर मैंने दस हज़ार खर्च कर दिये थे और हमें मिला क्या?” लोमड़ गुस्से से चिल्लाया.

वह सियार को पीटने ही वाला था कि पुलिस इंस्पेक्टर आ पहुंचा. उसे देख कर दोनों चोरों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई.

“तुम दोनों ने योजना तो अच्छी बनाई थी. कार में आग लगा दी और  हमारा सिपाही आग बुझाने लग गया, तुम यहाँ भीतर घुस आये. पर सिपाही ने मुझे फोन कर के तुरंत सूचना दे दी थी. मुझे लगा कि कुछ तो गड़बड़ है और मैं तुरंत आ पहुंचा.”

लोमड़ और सियार की बोलती बंद हो गयी थी. दोनों अपने को बहुत चालाक समझते थे. पर इस बार मात खा गये थे. भालू ने उन्हें चकमा दे दिया था, और इंस्पेक्टर उनकी चाल में न फंसा था. उलटे वह दोनों ही फंस गये थे. इंस्पेक्टर ने दोनों को हथकड़ी लगा दी और पुलिस स्टेशन ले आया. 
**************

 ©आइ बी अरोड़ा 

Friday, 12 February 2016

हाथी की दुकान
इक हाथी ने खोली दुकान
करने लगा वह भी कुछ काम
माल बहुत सा ले आया
सब को फिर संदेशा भिजवाया
“सामान सभी है मेरा अच्छा
सबसे बढ़िया सबसे सस्ता
झटपट न ले जाओगे
तो घाटे में रह जाओगे”
 पर कोई न आया लेने सामान
बैठे-बैठे बस हो गयी शाम
हाथी बहुत ही झुंझलाया
सब पर वह चीखा चिल्लाया
हल्ला सुन सिंह दौड़ा आया
हाथी पर उस को गुस्सा आया
सिंह ने खींचे हाथी के कान
बंद हो गई हाथी की दुकान.
© आइ बी अरोड़ा


Wednesday, 10 February 2016

बंदर की शैतानी
इक बंदर को सूझी शैतानी
किसी की पूंछ काटने की ठानी
देखा उस धूर्त ने चारों ओर
सब पूँछों पर किया कुछ गौर
एक पूंछ लगी कुछ मोटी
एक पूंछ लगी कुछ छोटी
एक पूंछ थी बहुत ही तगड़ी
एक पूंछ थी थोड़ी अकड़ी
पूंछ लोमड़ी की बन्दर को भायी
वही काटने की तरकीब बनाई
घर अपने लोमड़ी को बुलाया
उसको मछली भात खिलाया
पेट भरा तो लोमड़ी सुस्ताई
लेट गई वह ले नर्म रज़ाई
धूर्त बन्दर भी आ लेटा पास  
हाथ में  था इक चाक़ू ख़ास

हौले से उसने पूंछ को पकड़ा
मजबूती से उस पूंछ को जकड़ा
वार किया फिर इक चाक़ू से 
चीख निकली अपने ही मुंह से   
शैतानी का उसे मिला सबक था
पूंछ अपनी को ही काट दिया था.

© आइ बी अरोड़ा 

Sunday, 7 February 2016

गुब्बारा
इक भालू के थे बच्चे दो
नटखट बहुत थे दोनों वो
भालू इक दिन लाया गुब्बारा
रंग बिरंगा प्यारा-प्यारा
गुब्बारा देख बच्चे चिल्लाये
झटपट दोनों दौड़े आये
गुब्ब्बारा लेकर भागे दोनों
झूम खुशी से गये वह दोनों
फिर इक बोला दूजे से
“भइया, गुब्बारा फूला कैसे?”
गुब्बारे को उसने खूब टटोला
खूब सोच कर फिर वह बोला
“भीतर इसके है कोई बला  
तभी तो है यह इतना फूला 
चलो ज़रा कुछ ज़ोर लगायें
जो है भीतर उसे बाहर लायें”
दोनों ने तब पिचकाया गुब्बारा
पटाखे सा फट गया गुब्बारा.

©आइ बी अरोड़ा  

Friday, 5 February 2016

भूखा भेड़िया
एक भेड़िया था. पाँच दिनों से वो शिकार की तलाश में जंगल में यहाँ-वहां भटकता रहा था. पर बहुत भाग-दौड़ करने के बाद भी वो एक गिलहरी भी पकड़ न पाया था.
भूख से बेहाल हो कर उसने पास के गाँव में जाने की बात सोची. भेड़िये गाँव के अंदर नहीं जाते थे. उन्हें आदमियों से डर लगता था. 

उसने अपने-आपसे कहा, ‘मैं खूब होशियार रहूंगा. बड़ी सावधानी के साथ एक मुर्गा या बकरी पकड़ कर ले आउंगा. अधिक लालच न करूंगा.’
गाँव पहुँच कर वह चालाकी के साथ एक घर के भीतर आया. उसे एक बकरी दिखाई दी, वह बकरी पर झपटा मारने ही वाला था कि बकरी ने धीमे से कहा, ‘मुझे खाने की बात सोचना भी मत. मुझे निमोनिया हो रखा है. मेरे फेफड़े पूरी तरह गल चुके हैं. अगर तुमने मुझे खा लिया तो तुम्हें भी निमोनिया हो जायेगा. तुम्हारे फेफड़े गल जायेंगे और तुम मर जाओगे.’
भेड़िया रुक गया. निमोनिया शब्द ही उसने सुन न रखा था. वह जानता न था कि निमोनिया क्या बला है.  वह डर गया. बकरी को छोड़ वो चुपचाप वहां से चला गया.
अगले घर में उसने एक भेड़ देखी. वह धीरे-धीरे भेड़ की ओर रेंगने लगा. भेड़ ने उसे देख लिया और कहा, ‘जल्दी से कहीं छिप जाओ. शिकारी कुत्ते आते ही होंगे. उनसे बच कर रहना, सब के सब बहुत खतरनाक हैं. देर मत करो और यहीं कहीं छिप जाओ और अपनी जान बचाओ.’
शिकारी कुत्तों का सामना करने का उसमें साहस न था. वह झटपट वहां से भाग खड़ा हुआ.
अगले घर में एक मुर्गा था, खूब मोटा-ताज़ा. मुर्गे को देख भेड़िये के मुहं में पानी आ गया. उसने मन ही मन कहा, ‘इसे तो मैं खा ही जाउंगा.’
भेड़िये को देखते ही मुर्गा चिल्लाया, ‘अरी ओ डायन, आज तुम ने भेड़िये का भेष बना रखा है. तुम कोई भी भेष बना लो पर तुम बच नहीं सकती. मैंने तुम्हें पहचान लिया है. तुम डायन ही हो. मेरा मालिक कब से तुम्हें ढूंढॅ रहा है. वह तुम्हें पकड़ कर पेड़ से बाँध देगा और आग लगा देगा. मैं अभी उसे बुलाता हूँ.’
इतना कह मुर्गे ने ज़ोर से चिल्लाया, 'डायन आ गई, डायन आ गई.'

भेड़िये के होश उड़ गये और वह दुम दबा कर भाग खड़ा हुआ. वह बहुत थक चुका था और भूख के मारे उसका बुरा हाल हो गया था.
उसने एक घर के भीतर झाँक कर देखा. वहां उसने एक मोटा-ताज़ा सूअर देखा.
‘इसे तो मैं नहीं छोडूंगा. मैं इसकी कोई बात नहीं सुनूंगा,' उसने मन ही मन कहा.
सूअर ने भेड़िये की ओर देखा और बिना किसी डर के मुंह मोड़ कर खड़ा हो गया. भेड़िये को गुस्सा आ गया. 
‘इसकी इतनी हिम्मत, मेरी ओर अपनी पीठ कर दी. अभी मज़ा चखाता हूँ.’
इतना कह भेड़िया सूअर पर झपटा. तभी एक धमाका-सा हुआ. एक गर्म, बुद्बुदार हवा का गोला भेड़िये से आ टकराया.
सूअर ने अपने पेट में भरी पवन को मुक्त कर दिया था, वह पवनमुक्त आसन जो करने लगा था.

सूअर द्वारा छोड़े इस 'रासायनिक बम' को बेचारा भूखा भेड़िया सह न पाया और वहीँ ढेर हो गया.

Tuesday, 2 February 2016

जंगल में हड़ताल
जंगल में जब हुई हड़ताल
भेड़िये ने की जांच पड़ताल
एक-एक कर सब को बुलाया
सब को मीठा जलपान कराया
एक-एक कर पूछा सब को
“कष्ट क्या है, बतलाओ मुझको”
हर एक ने बस यही कहा
“अब तक हमने बहुत सहा
जंगल की राजा की मनमानी
अब न सहेंगे यही है ठानी”
सुन कर यह भेड़िया घबराया
सिंहासन था उसने हथिआया
उसने सब को खूब धमकाया
 सब पर अपना रौब जमाया
लालच भी कुछ दिया उसने
गुस्सा भी दिखलाया उसने
पर उसकी अब चली न एक
जंगल वासी सब हुए थे एक
एकता का सबने फल पाया
दुष्ट भेड़िये को मार भगाया
स्वतन्त्रता अब पाई सब ने
साथ रहेंगे हम ठानी मन में
© आइ बी अरोड़ा



Saturday, 30 January 2016

साहस का कार्य
अब तक बच्चे ने घोंसले से बाहर झाँक कर नीचे देखने का साहस न किया था. नीचे, बहुत नीचे सागर था. वह सागर की ध्वनी सुन पा रहा था. लहरें जब नीचे चट्टानों से टकराती थीं तो वह चट्टानों का कम्पन भी महसूस कर पा रहा था.
एक दिन उसे इस घोंसले से बाहर जाना ही होगा, ऐसा सोच वह थोड़ा सहम जाता था.
‘आज तुम्हें नीचे जाना होगा, कूदने के लिए तैयार हो जाओ,’ माँ ने उसे धीरे से चट्टान के सिरे तक धकेला. उसने पहली बार नीचे देखा. नीचे सागर की लहरें तट से टकरा रहीं थीं.
‘हम बहुत ऊपर हैं? मैं नीचे कैसे पहुंचूंगा?’ उसने थरथराती हुई आवाज़ में पूछा.
‘डरने की कोई बात नहीं है, नीचे कूद जाओ, मेरी बात का विश्वास करो, तुम्हें कुछ न होगा, तुम नीचे पहुँच जाओगे,’ माँ ने प्यार से समझाते हुए कहा.
‘मुझे यहीं इस घोंसले में रहना है, मुझे यहाँ अच्छा लगता है,’ उसने बहाना बनाया.
‘इस घोंसले में तो जीवन भर नहीं रह सकते, यहाँ खाने को भी कुछ नहीं है. सब बच्चे अपने-अपने घोंसले छोड़ कर नीचे जा चुके हैं. अब तुम्हें भी जाना है.’
‘अगर मैं चट्टान पर गिर गया तो?’
‘सब बच्चे बिना टकराये नीचे पहुँच जाते है.’
‘क्या सच में सब बच्चे नीचे पहुँच जाते हैं?’
‘सत्य तो यही है कि कुछ बच्चे चट्टानों पर गिर कर मर जाते हैं. पर फिर भी  तुम्हें प्रयास करना ही होगा. अपने-आप में विश्वास रखो और कूद जाओ.’
माँ ने उसे कूदने के लिए प्रेरित किया. घोंसला छोड़ते समय माँ ने कहा, ‘जब मैं कूदने के लिए कहूँ तब झट से कूद जाना.
कुछ समय बाद माँ ने पुकारा, ‘कूद जाओ.’
उसने सहमी हुई आँखों से आकाश में उड़ती माँ को देखा. फिर उसने नीचे देखा. चट्टानों को देख वह भयभीत हो गया. उसके पाँव हिल ही न पा रहे थे.
‘हम पीढ़ियों से ऐसे साहस के कार्य करते आये हैं. विश्वास रखो और कूद जाओ,’ माँ ने फिर पुकारा.
उसने माँ की पुकार सुनी परन्तु उसकी झिझक कम न हुई.  
कुछ पलों बाद वह कूद गया. वह नहीं जाता था कि आज के बाद वह कोई साहस का कार्य कर पायेगा या नहीं.

Wednesday, 9 September 2015

उलटा मंत्र


बन्दर जादू सीख कर आया
सब पशुओं को उसने सताया
लंबी कर दी लोमड़ की पूंछ
गायब कर दी शेर की मूंछ
फिर मंत्र फूंका ऐसा एक
दाँत उखड़ा हाथी का एक
सब पशुओं को किया हैरान
पर बुरा हुआ उसका अंजाम
इक दिन कुछ हुआ घुटाला
मंत्र इक उलटा पढ़ डाला
उलटे मंत्र ने किया कमाल
सर के उड़ गये उसके बाल
गंजा हो गया वह शैतान
खींचने लगा अपने ही कान

© आइ बी अरोड़ा