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Friday, 24 June 2016

पानी का डर

नन्हें हाथी को लगता था
पानी से थोड़ा डर
फिर भी हर दिन नदी में
उसको जाना पड़ता था पर.
माँ थी उसकी ज़रा कठोर
गुस्सा आता उसको नन्हें हाथी पर
अगर नहाने में वो नन्हा हाथी
करता कभी किन्तु-अगर-मगर.
नन्हें हाथी ने इक दिन देखी
नदी में जाती इक नाव
नाव देख उसके मुंह से निकला  
‘वाओ वाओ वाओ.
ऐसी निराली चीज़ तो मैंने  
न देखी थी कहीं अब तक
मुझे भी चाहिये ऐसी नाव
लेकर रहूँगा मैं अपना हक़.’
झटपट आकर माँ से बोला
कही उससे मन की बात
फ़रमाईश सुन माँ झुंझलाई
और सिर पर मारा अपना हाथ.
तभी नदी में बहती देखी माँ ने
कागज़ की इक सुंदर नाव
माँ बोली, ‘नदी में जल्दी से जाओ  
और पकड़ लो वह बहती नाव.’
नन्हा हाथी दौड़ा झटपट
और भूल गया पानी का डर
बड़ी फुर्ती से लगा तैरने
नाव वो पकड़ न पाया पर.
लौट कर वो माँ से बोला,
‘नाव तो खो गई पानी में’
‘तुम ऐसे तैर पाओगे बेटा  
सोचा भी न था सपने में.
तुम्हें आज तो पानी से
लगा न बिलकुल भी डर
मैं तो सदा ही कहती थी
 तुम हो सबसे अधिक निडर.’  
नन्हा हाथी उछल पड़ा
सुनकर अपनी प्रशंसा
खूब अकड़ कर वह बोला
‘माँ, मैं तो हूँ ही ऐसा.’

©आइ बी अरोड़ा 

Tuesday, 7 June 2016

पत्तों का ढेर
वहां उधर जो है
पत्तों का इक ढेर,
वहीं छिप कर बैठा है
इक चालाक शेर.

इकट्ठे कर रखे हैं उसने
ढेर सारे मीठे बेर,
फंसेगा उसकी चाल में
कोई न कोई देर-सवेर.

इक हिरण को अच्छे
लगते थे मीठे बेर,
मीठे बेर खाए पर
हो गई थी बहुत देर.

सपने में भी बेचारे को 
दिखते थे अब बेर,
चारों ओर ढेर ही ढेर
बस मीठे मीठे बेर.

हिरण ने देखा वहां
पत्तों का इक ढेर,
उसे लगा वहां रखे थे
बहुत से मीठे बेर.

झट से दौड़ा हिरण
नहीं की कोई देर,
पर उड़ गए होश
जब सामने आ गया शेर.

शेर लपका पर
कर बैठ वो थोड़ी देर,
और बीच में आ गया
पत्तों का इक ढेर.

हिरण भागा छोड़ वहीं
मीठे मीठे बेर,
समझ गया कि यह था
शेर का इक हेर-फेर.

वहां उधर जो है
पत्तों का इक ढेर,
वहीं पड़े हैं ढेर सारे  
मीठे मीठे बेर.

खा रहा इक चतुर बटेर
मज़े से मीठे मीठे बेर,
छिप गया था वह पत्तों में
देखा जब उसने इक शेर.  

© आइ बी अरोड़ा  

Sunday, 29 May 2016

नन्हा नटखट हाथी
इक नन्हा हाथी था
बहुत ही नटखट
दौड़ता-भागता रहता था
वो झटपट-झटपट
नानी को इक दिन
उस पर गुस्सा आया
पकड़ उसे
ज़ोर का चपत लगाया
फिर थोड़ा चीख कर
बोली नानी
‘मूर्ख, तुमने एक बात
अभी तक न जानी
जंगल में हरदम
रहना पड़ता है होशियार
शत्रु हमारे रहते हैं
खाने को हरदम तैयार
अपने भाई-बहनों को देखो
और कुछ सीखो
सदा रहो झुण्ड के पास
वरना जाओगे खो’
नन्हा हाथी खूब हंसा
नानी की बातों पर
दौड़ने लगा तेज़ी से
वो नटखट इधर-उधर  
फिर आँखें मिचकाईं
और कहा नानी से
‘नानी, आज तुम भी
कुछ सीख लो मुझसे
आ जाये अगर शत्रु सामने
तो इतना करना
नहीं देखना दायें-बाएं
बस सीधा चलना 
जो भागेगा तेज़
उसी के बचने की है आस
तेज़ भागने का मैं बस 
हरदम करता हूँ अभ्यास’

*******
©आइ बी अरोड़ा 

Thursday, 26 May 2016

जंगल में थे सारे सोये
जंगल में थे सारे सोये
मीठे सपनों में थे खोये
कोई सोया घास में छिपकर
कोई सोया पेड़ के ऊपर     
कोई सोया माँद के भीतर
और कोई किसी झाड़ पे चढ़कर   
किसी ने ओढ़ी डालों की चादर
किसी के ऊपर फैला अंबर  
कोई सोया ले पत्तों की ओट
बंद किये अपने प्यारे होंठ  
तभी अचानक हुआ धमाका
हर कोई सोया नींद से जागा   
डर कर हर इक उठ कर बैठा
जान बचाने को हर कोई भागा
सब पर आफत आन पड़ी
धमाकों की थी लगी झड़ी    
भालू ने ही साहस दिखलाया
छड़ी लिए वह घर से आया
सब के सब थे हुए हैरान
वन में आया कैसा तूफ़ान  
‘भालू ही अब कुछ कर पाये
कैसे भी कर संकट से बचाये’
भालू पर था थोड़ा सहमा
साथ न था कोई अपना
अँधेरे से उसे लगता था डर
कुछ तो करना होगा पर   
‘सब के सब हैं बैठे छिपकर
कोई तो आता घर से बाहर’
पर अब न था कोई उपाये 
मन चाहे क्यों न घबराए
छड़ी थामे चला उस ओर
धमाके हो रहे थे जिस ओर
देखी वहां इक बात निराली
मुहं से निकल गयी इक गाली
इक पेड़ के नीचे था हाथी
जिसका था न कोई साथी
हाथी बैठा था पकड़े माथा
लगातार वह छींक रहा था
‘भाई, रखो तुम मुझ से दूरी
बिगड़ गई है हालत मेरी
कई बार कहा था नानी ने  
न जाना ठन्डे पानी में
मुझे लगा है आज ज़ुकाम
अब छींकें आ रहीं बिना विराम’
भालू हंसी रोक न पाया
लौट कर उसने सबको बतलाया
हाथी पर सबको गुस्सा आया
पर रातभर कोई सो न पाया.

© आइ बी अरोड़ा 

Tuesday, 24 May 2016

मेंडक ने जब कूद लगाई
मेंडक ने जब कूद लगाई
रोक न पाया बन्दर भाई
उसे आई खूब हंसीं
पेड़ में उसकी पूंछ फंसी
वो हंसता था मेंडक पर
बैठा था  इक पेड़ के ऊपर
नीचे मेंडक उछल रहा था
परवाह किसी की करता न था
उसने देखा था इक सपना
सपने में देखा था इक अपना
चाँद पर था जो मस्ती से लेटा
‘तुम भी आओ यहाँ पर बेटा’
उसने था यूँ मेंडक से कहा
मेंडक के मन तब जागी इच्छा
‘क्यों न मैं भी जाऊं चाँद पर
पर जाऊं कैसे मैं इतना ऊपर’
उसने क्या खूब सोच-विचार
मुहं में रखे आम अचार
‘दिन भर अब मैं करूं यही
लम्बी कूदें लगाऊं कई’
मेंडक ने फिर इक कूद लगाई
रोक न पाया बन्दर भाई
उसे आई खूब हंसी
पेड़ में उसकी पूंछ फंसी.


Thursday, 24 March 2016

होली आई

होली आई होली आई 
ज़ोर से बोला भालू भाई
रंगों की पिचकारी लेकर
 लोमड़ी झटपट दौड़ी आई 

बन्दर भी भागा भागा आया
मुंह अपने पर ही रंग लगाया
बन्दर पर थी मस्ती छाई
होली थी उसकी मन भायी

भालू ने हाथी पर रंग डाला
मुंह उसका नीला कर डाला
पर हाथी भी था न कोई कम
भालू को उसने पीला रंग डाला

लाल गुलाल और हल्का पीला
हरा बैंगनी और पक्का नीला
जिसने  भी जो रंग पाया
उसी रंग में सबको नहलाया

पर एक जानवर ऐसा भी था
जिसको कोई रंग न पाया 
छिप कर था वह बैठा घर में
 कोई उसे ढूंढ न पाया

वह तो था जंगल का राजा
रंगों से था वह पर डरता
होली पर वह छिप कर रहता
होली पर वह नाटक करता

लोमड़ी भी थी खूब चालाक
शेर को उसने ढूंढ निकाला
शेर छिपा था बिस्तर के नीचे
सबने उसको खींच निकाला

शेर बहुत ज़ोर से चिल्लाया
“बहुत बीमार हूँ मैं भाइया
रात भर मुझ को नींद न आई 
 कुछ तो तरस करो तुम भाई”

कौन था पर उसकी सुनने वाला 
यह नाटक था देखा भाला
सब ने उस पर हर रंग डाला
और मुंह कर दिया थोड़ा काला

फिर सब मिलकर सुर में गाये
“साल में इक बार होली आये  
होली में जो भी छिप जाए
उसे तो बस भगवान बचाये"

© आइ बी अरोड़ा 

Wednesday, 9 September 2015

उलटा मंत्र


बन्दर जादू सीख कर आया
सब पशुओं को उसने सताया
लंबी कर दी लोमड़ की पूंछ
गायब कर दी शेर की मूंछ
फिर मंत्र फूंका ऐसा एक
दाँत उखड़ा हाथी का एक
सब पशुओं को किया हैरान
पर बुरा हुआ उसका अंजाम
इक दिन कुछ हुआ घुटाला
मंत्र इक उलटा पढ़ डाला
उलटे मंत्र ने किया कमाल
सर के उड़ गये उसके बाल
गंजा हो गया वह शैतान
खींचने लगा अपने ही कान

© आइ बी अरोड़ा  

Friday, 21 August 2015

रोनी सूरत


अगर कभी तुम को जाना पड़े
बाहर
रात के अँधेरे में
अगर रास्ता हो सुनसान
तो भइया रहना थोड़ा सावधान
तुम को सुनाई दे सकती है
तुम्हारा पीछा करती
किसी के क़दमों की आहट
जिस को सुन
मन में हो सकती है तुम्हारे  
थोड़ी-बहुत घबराहट
अगर सुनाई दे
कुत्तों के रोने की आवाज़
तो समझ लेना
होंगे तुम्हारे ही आस-पास
भूत-प्रेत
जो दिखाई तो नहीं देते
पर चुपचाप
सब के पीछे-पीछे हैं चलते
जब बाहर हो अँधेरा
और रास्ते हों सुनसान
घर के भीतर रहना ही होता है
सब के लिए आसान 
पर फिर भी बाहर जाना
हो जाये अगर अति आवश्यक
तो एक ही उपाय होगा
ऐसी स्थिति में निर्णायक
साथ रखना अपने तुम  
माचिस जो न हो गीली  
 अपने दांतों से दबौच लेना
माचिस की सुलगती एक तीली
ज़ोर-ज़ोर से फिर सांस लेना
और खुले रखना अपने होंठ
तब देखना
होगा कैसा वहां तमाशा
क्योंकि
यह मूर्ख भूत-प्रेत समझते हैं
बस यही एक भाषा
भूत-प्रेत
जो कर रहे थे चुपचाप
तुम्हारा पीछा
डर से वह सब लगेंगे कांपने
और अपनी जान बचाने को
भागेंगे यहाँ-वहां
न देखेंगे कोई आगा-पीछा
आँखें उनकी हो जायेंगी गीली
और चहेरे से गायब
हो जायेगी उनकी हँसी
उन भूतों की रोनी सूरत देख कर
तुम सब को
तब आयेगी खूब हंसी.

© आइ बी अरोड़ा