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Monday, 15 February 2016

निगरानी
भालू पुलिस स्टेशन आया. उसे देख इंस्पेक्टर ने पूछा, “ कैसे आना हुआ? सब ठीक तो है?”

भालू कुछ कहने वाला ही था कि एक सिपाही सियार को गर्दन से पकड़ कर इंस्पेक्टर के पास ले आया.

सियार को देख इंस्पेक्टर भड़क गया. गुस्से से बोला, “ तुम कब सुधरोगे? जेल से छूटे अभी चार दिन भी नहीं हुए और बदमाशी करने लगे.”

“मैंने कुछ नहीं किया. आपका यह सिपाही मुझ से पैसे मांग रहा था. मैंने मना कर दिया तो मुझे पकड़ कर ले आया,” सियार ने अकड़ कर कहा.

“साहब, यह एक बड़ा-सा चाकू लिए बाज़ार में घूम रहा था,” सिपाही ने चाक़ू दिखाते हुए कहा.

“यह झूठ बोल रहा है, यह चाक़ू मेरा नहीं है,” सियार चिल्लाया.

वहां दीवार के पास खड़े हो जाओ, तुम से मैं बाद में निपटूंगा,इतना कह इंस्पेक्टर ने भालू से पूछा, “आप कुछ कह रहे थे?”

“हम लोग एक सप्ताह के लिए अचरज वन जा रहे हैं. आप अपने सिपाही से कह दें कि मेरे घर पर निगरानी रखे.”

“अच्छा किया आपने मुझे बता दिया. आप निश्चिंत रहें. बस, जाते समय सारे दरवाज़े, खिड़कियाँ ठीक से अवश्य बंद कर देना.”

“वह तो मैं स्वयं करूंगा. सोचता हूँ सारे गहने और रूपए एक तिजौरी में बंद कर अपने बड़े ट्रंक में रख दूँ और ट्रंक को एक बड़ा सा ताला लगा दूँ.”

“अरे, आप इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं, हम हैं न घर की निगरानी करने के लिए.”

“आप ठीक कहते हैं पर मैं तिजौरी को ऐसे बाहर छोड़ के नहीं जा सकता.” इतना कह भालू लौट गया.

भालू की जाते ही इंस्पेक्टर ने सियार की ओर गुस्से से देखा. सियार ने हाथ जोड़ कर इंस्पेक्टर से क्षमा मांगी और कहा कि वह कभी भी, कोई भी गलत काम नहीं करेगा. इंस्पेक्टर ने उसे चेतावनी दे कर जाने दिया.

सियार भागा-भागा लोमड़ के पास आया और बोला, “बॉस, ऐसी खबर लाया हूँ कि सुन कर उछल पड़ोगे.”

“क्या पेड़ों पर पैसे उगने लगे?” लोमड़ ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा.

“भालू एक सप्ताह के लिये अचरज वन जा रहा है. उसके जाते ही हम उसके घर में चोरी करेंगे और उसकी तिजौरी में रखा सारा माल चुरा लेंगे.”   

सियार ने यह न बताया कि भालू ने पुलिस इंस्पेक्टर से कहा था कि उसके घर पर निगरानी रखे.

लोमड़ बहुत खुश हुआ और दोनों ने एक योजना बना ली. जिस रात भालू अचरज वन गया उस रात दोनों चोर भालू के घर के निकट छिप गये. उस रास्ते पर एक पुलिस का सिपाही बीच-बीच में चक्कर लगा रहा था. सियार ने उसकी ओर संकेत किया तो लोमड़ ने भी संकेत कर कहा कि कोई चिंता की बात नहीं.

रात एक बजे भालू के घर के निकट सड़क किनारे खड़ी एक कार में आग लग गई. यह लोमड़ की योजना थी. उस समय पुलिस वाला निकट ही था. वह गाड़ी की ओर भागा और आग बुझाने की कोशिश करने लगा.

सियार और लोमड़ इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे. वह झटपट भालू के घर में घुस गये. भीतर जाकर सियार वह ट्रंक खोजने लगा जिसमे भालू ने अपनी तिजौरी रखी थी.

“तुम्हें कैसे पता कि तिजौरी ट्रंक के अंदर है?” लोमड़ ने फुसफुसा कर पूछा.

“मुझे सब मालूम है, बस तुम चुपचाप खड़े रहो,” सियार ने अकड़ कर कहा. उसने लोमड़ को जानबूझ कर सारी बात न बताई थी.

ट्रंक मिलते ही सियार ने उस पर लगा ताला खोल दिया. ताले खोलने में वह बहुत माहिर था.

ट्रंक के अंदर एक तिजौरी थी. सियार झटपट तिजौरी खोलने लगा, पर तिजौरी खुली ही नहीं.

“इसे ही ले चलते हैं,” लोमड़ ने कहा.

“नहीं, अगर सिपाही आ गया तो इसे कैसे छिपाएंगे?” सियार ने कहा.

“वह तो आग बुझाने में व्यस्त है,” लोमड़ बोला.

“फिर भी हम कोई जोखिम नहीं उठा सकते. धीरज रखो, अभी तिजौरी खुल जायेगी,” सियार ने कहा. तभी तिजौरी खुल गई.

“जल्दी सारा माल निकालो,” लोमड़ ने कहा.

सियार ने तिजौरी में हाथ डाला.

पर यह क्या? भीतर तो कुछ भी नहीं था. सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा था. कागज़ के टुकड़े को सियार के हाथ से छीन कर लोमड़ पढ़ने लगा. उस पर लिखा था, ‘तुम्हारी मेहनत बेकार गई, इस बात का मुझे बड़ा खेद है. मैंने सारे गहने और रूपए कहीं ओर छिपा कर रख दिए हैं. ढूँढने का प्रयास भी न करना. अब समय नष्ट न करो और भागो. पुलिस आती ही होगी-- तुम्हारा शुभचिंतक भालू.’

गुस्से से लोमड़ की आँखें लाल हो गयीं. सियार डर गया. बोला, “मुझे क्या पता था कि भालू इतना धूर्त है. चलो निकल चलो यहाँ से, कहीं पुलिस न आ जाये.”

“उस गाड़ी पर मैंने दस हज़ार खर्च कर दिये थे और हमें मिला क्या?” लोमड़ गुस्से से चिल्लाया.

वह सियार को पीटने ही वाला था कि पुलिस इंस्पेक्टर आ पहुंचा. उसे देख कर दोनों चोरों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई.

“तुम दोनों ने योजना तो अच्छी बनाई थी. कार में आग लगा दी और  हमारा सिपाही आग बुझाने लग गया, तुम यहाँ भीतर घुस आये. पर सिपाही ने मुझे फोन कर के तुरंत सूचना दे दी थी. मुझे लगा कि कुछ तो गड़बड़ है और मैं तुरंत आ पहुंचा.”

लोमड़ और सियार की बोलती बंद हो गयी थी. दोनों अपने को बहुत चालाक समझते थे. पर इस बार मात खा गये थे. भालू ने उन्हें चकमा दे दिया था, और इंस्पेक्टर उनकी चाल में न फंसा था. उलटे वह दोनों ही फंस गये थे. इंस्पेक्टर ने दोनों को हथकड़ी लगा दी और पुलिस स्टेशन ले आया. 
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 ©आइ बी अरोड़ा 

Tuesday, 12 May 2015

निगरानी

भालू पुलिस स्टेशन आया. उसे देख इंस्पेक्टर ने पूछा, “ कैसे आना हुआ? सब ठीक तो है?”

भालू कुछ कहने वाला ही था कि एक सिपाही सियार को गर्दन से पकड़ कर इंस्पेक्टर के पास ले आया.

सियार को देख इंस्पेक्टर भड़क गया. गुस्से से बोला, “ तुम कब सुधरोगे? जेल से छूटे अभी चार दिन भी नहीं हुए और बदमाशी करने लगे.”

“मैंने कुछ नहीं किया. आपका यह सिपाही मुझ से पैसे मांग रहा था. मैंने मना कर दिया तो मुझे पकड़ कर ले आया,” सियार ने अकड़ कर कहा.

“साहब, यह एक बड़ा-सा चाकू लिए बाज़ार में घूम रहा था,” सिपाही ने चाक़ू दिखाते हुए कहा.

“यह झूठ बोल रहा है, यह चाक़ू मेरा नहीं है,” सियार चिल्लाया.

वहां दीवार के पास खड़े हो जाओ, तुम से मैं बाद में निपटूंगा,इतना कह इंस्पेक्टर ने भालू से पूछा, “आप कुछ कह रहे थे?”

“हम लोग एक सप्ताह के लिए अचरज वन जा रहे हैं. आप अपने सिपाही से कह दें कि मेरे घर पर निगरानी रखे.”

“अच्छा किया आपने मुझे बता दिया. आप निश्चिंत रहें. बस, जाते समय सारे दरवाज़े, खिड़कियाँ ठीक से अवश्य बंद कर देना.”

“वह तो मैं स्वयं करूंगा. सोचता हूँ सारे गहने और कीमती सामान एक तिजौरी में बंद कर अपने बड़े ट्रंक में रख दूँ और ट्रंक को एक बड़ा सा ताला लगा दूँ.”

“अरे, आप इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं. हम हैं न घर की निगरानी करने के लिए.”

“आप ठीक कहते हैं पर मैं तिजौरी को ऐसे बाहर छोड़ के नहीं जा सकता.” इतना कह भालू लौट गया.

भालू की जाते ही सियार ने हाथ जोड़ कर इंस्पेक्टर से क्षमा मांगी और कहा कि वह कभी भी, कोई भी गलत काम नहीं करेगा. इंस्पेक्टर ने उसे चेतावनी दे कर जाने दिया.

सियार भागा-भागा लोमड़ के पास आया और बोला, “बॉस, ऐसी खबर लाया हूँ कि सुन कर उछल पड़ोगे.”

“क्या पेड़ों पर पैसे उगने लगे?” लोमड़ ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा.

“भालू एक सप्ताह के लिये अचरज वन जा रहा है. उसके जाते ही हम उसके घर में चोरी करेंगे और उसकी तिजौरी में रखा सारा माल चुरा लेंगे.”   

सियार ने यह न बताया कि भालू ने पुलिस इंस्पेक्टर से कहा था कि उसके घर पर निगरानी रखे.

लोमड़ बहुत खुश हुआ और दोनों ने एक योजना बना ली. जिस रात भालू अचरज वन गया उस रात दोनों चोर भालू के घर के निकट छिप गये. उस रास्ते पर एक पुलिस का सिपाही बीच-बीच में चक्कर लगा रहा था. सियार ने उसकी ओर संकेत किया तो लोमड़ ने भी संकेत कर कहा कि कोई चिंता की बात नहीं.

रात एक बजे भालू के घर के निकट एक पुरानी कार में आग लग गई. यह लोमड़ की योजना थी. पुलिस वाला निकट ही था. वह गाड़ी की ओर भागा और आग बुझाने की कोशिश करने लगा.

सियार और लोमड़ इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे. वह झटपट भालू के घर में घुस गये. भीतर जाकर सियार वह ट्रंक खोजने लगा जिसमे भालू ने अपनी तिजौरी रखी थी.

“तुम्हें कैसे पता कि तिजौरी ट्रंक के अंदर है?” लोमड़ ने फुसफुसा कर पूछा.

“मुझे सब मालूम है, बस तुम चुपचाप खड़े रहो,” सियार ने अकड़ कर कहा. उसने लोमड़ को जानबूझ कर सारी बात न बताई थी.

ट्रंक मिलते ही सियार ने उस पर लगा ताला खोल दिया. ताले खोलने में वह बहुत माहिर था.

ट्रंक के अंदर एक तिजौरी थी. सियार झटपट तिजौरी खोलने लगा, पर तिजौरी खुली ही नहीं.

“इसे ही ले चलते हैं,” लोमड़ ने कहा.

“नहीं, अगर सिपाही आ गया तो इसे कहाँ छिपाएंगे?” सियार ने कहा.

“वह नहीं आयेगा, वह आग बुझाने में व्यस्त है.” लोमड़ बोला.

“हम कोई जोखिम नहीं उठा सकते. धीरज रखो, अभी तिजौरी खुल जायेगी,” सियार ने कहा. तभी तिजौरी खुल गई.

“जल्दी सारा माल निकालो,” लोमड़ ने कहा.

सियार ने तिजौरी में हाथ डाला.

पर यह क्या? भीतर तो कुछ भी नहीं था. सिर्फ एक कागज़ था. वह कागज़ सियार के हाथ से छीन कर लोमड़ पढ़ने लगा. लिखा था, ‘तुम्हारी मेहनत बेकार गई, इस बात का मुझे बड़ा खेद है. सियार को पुलिस स्टेशन में देख कर मेरे कान खड़े हो गये थे. इसलिये मैंने सारे गहने वगेरह कहीं और छिपा कर रख दिए हैं. ढूँढने का प्रयास भी न करना. अब समय नष्ट न करो और भाग जाओ. पुलिस आती ही होगी- तुम्हारा शुभचिंतक भालू.’

गुस्से से लोमड़ की आँखें लाल हो गयीं. सियार डर गया. बोला, “मुझे क्या पता था कि  भालू इतना धूर्त है. चलो निकल चलो यहाँ से, कहीं पुलिस न आ जाये.”

“उस पुरानी गाड़ी पर मैंने दस हज़ार खर्च कर दिये थे और यहाँ मिला क्या?” लोमड़ गुस्से से चिल्लाया.

वह सियार को पीटने ही वाला था कि पुलिस इंस्पेक्टर आ पहुंचा. उसे देख कर दोनों चोरों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई.

“तुम दोनों ने योजना तो अच्छी बनाई थी. पुरानी कार में आग लगा दी, हमारा सिपाही उस कार में उलझ गया और तुम यहाँ भीतर घुस आये. पर सिपाही ने एक समझधारी की, मुझे फोन कर के तुरंत सूचना दे दी. मुझे लगा कि कुछ तो गड़बड़ है. और मैं तुरंत आ पहुंचा आपकी सेवा में,” इंस्पेक्टर ने कहा और खिलखिला कर हंस दिया.

लोमड़ और सियार की बोलती बंद हो गयी थी. दोनों अपने को बहुत चालाक समझते थे. पर इस बार मात खा गये थे. भालू ने उन्हें चकमा दे दिया था, और इंस्पेक्टर उनकी चाल में न फंसा था. उलटे वह दोनों ही फंस गये थे. 

इंस्पेक्टर ने दोनों को हथकड़ी लगा दी और पुलिस स्टेशन ले आया. 
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 ©आई बी अरोड़ा 

Wednesday, 1 April 2015


अप्रैल फूल
(अंतिम भाग)
(कहानी का पहला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं)


बैंक के निकट उसने एक गाड़ी खड़ी थी. बैंक का दरवाज़ा खुला था. उसका माथा ठनका. वह सावधानी के साथ आगे आया. बैंक का चोकीदार दरवाज़े के पास लेटा था. वह बेहोश था. बैंक के अंदर एक चोर था. उसने अपने चेहरे को एक नकाब से छिपा रखा था. बैंक की तिजोरी खुली थी. चोर एक बैग में रुपये रख रहा था.

हिरण ने सोचा कि उसे पुलिस को सूचना देनी चाहिये. परन्तु जल्दबाज़ी में वह अपना सेल फोन घर ही छोड़ आया था. पुलिस स्टेशन अधिक दूर न था. वह पुलिस स्टेशन की और भागा.

तभी उसने देखा कि जहां पर चोर ने अपनी गाड़ी खड़ी कर रखी थी वहीं सड़क में एक मैनहोल था. कुछ सोच कर उसने मैनहोल का ढक्कन उठा कर एक ओर रख दिया और अँधेरे में छिप कर चोर की प्रतीक्षा करने लगा.

उसे ज़्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. थोड़े समय बाद ही चोर रुपयों से भरा बैग लेकर बैंक से बाहर आया. उसने चारों ओर देखा. उसे कोई दिखाई न दिया. वह बड़ी होशियारी के साथ अपनी गाड़ी की ओर चल दिया.

तभी हिरण ज़ोर से चिल्लाया, “चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो”

हिरण की चीख पुकार सुन, चोर घबरा गया और अपनी गाड़ी की ओर भागा. परन्तु हड़बड़ाहट में उसने देखा ही नहीं की रास्ते में एक बिना ढक्कन का मैनहोल. चोर सीधा मैनहोल में जा गिरा. रुपयों से भरा बैग उसके हाथ से छूट कर सड़क के एक ओर जा गिरा.

हिरण ने तुरंत बैग उठाया और पुलिस स्टेशन की ओर भागा. वहां उसने पुलिस इंस्पेक्टर को सारी बात बताई. वहीं से उसने अपने मैनेजर  को भी फोन किया और घटना की जानकारी दे दी.

दो सिपाहियों के साथ इंस्पेक्टर बैंक की ओर चल दिया. चोर अभी भी मैनहोल के अंदर था. गिरते समय उसके पैर में चोट लग गई थी और वह करहा रहा था. सिपाहियों ने उसे बाहर निकाला. उसके चेहरे से नकाब हटाई. वह तो लोमड़ था.

“अरे, इस बदमाश को तो हम एक साल से ढूंढ रहे हैं, इस पर तो दस हज़ार का इनाम भी है. हिरण भाई, आज तो आपने कमाल कर दिया. जिसे अपराधी को हम इतने दिनों तक नहीं पकड़ पाये उसे आपने अपनी सूझबूझ से पकड़वा दिया. आपको तो पुरस्कार मिलेगा,” इंस्पेक्टर ने कहा. 

इस बीच बैंक मैनेजर भी आ पहुंचा था. उसने भी हिरण की प्रशंसा की और कहा, “बैंक की ओर से भी आपको पुरस्कार दिया जाएगा.”

हिरण घर लौटा. सियार और भेड़िया खिड़की के निकट बैठे उसके लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे. उसे आता देख सियार ने कहा, “क्या आज कल रात में भी बैंक में काम होता है?”

“अरे, आज तो मैंने अकेले ही बैंक को लुटने से बचा लिया. लोमड़ बैंक में चोरी करने आया था. वह पकड़ा गया. सरकार से मुझे दस हज़ार का पुरस्कार मिलेगा. बैंक से भी पुरस्कार मिलेगा.” हिरण एक हीरो की तरह मुस्कुरा रहा था.

सियार और भेड़िये की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी. वह तो उसे मूर्ख बन रहे थे, और वह हीरो बन गया था.

“ भाई, यह तो हम ही अप्रैल फूल बन गये,” सियार ने कहा.

भेड़िया क्या कहता, वह तो खुद ही दुःखी था.
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© आई बी अरोड़ा



Tuesday, 31 March 2015

अप्रैल फूल
(पहला भाग)

मार्च का अंतिम दिन था. भेड़िये ने सियार से कहा, “अरे यार, कल किस सज्जन को मूर्ख बनाया जाये.”

“कल क्या ख़ास बात है?” सियार ने पूछा.

“भूल गये? कल पहली अप्रैल है. हर वर्ष पहली अप्रैल के दिन हम किसी न किसी को मूर्ख बनाते ही हैं.”

दोनों किसी को मूर्ख बनाने की योजना बनाने लगे. तभी उन्होंने खिड़की से हिरण को अपने घर जाते हुए देखा.

“क्यों न इसे मूर्ख बनाया जाये?” सियार ने हिरण की ओर संकेत करते हुए कहा.

“हां, यह बड़ा ही भोला-भाला प्राणी है. इसे तो सरलता से मूर्ख बना सकते हैं,” भेड़िये ने कहा.

अगले दिन सियार और भेड़िया मिल कर अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ने लगे. परन्तु हिरण को कैसे मूर्ख बनाया जाये, उन्हें सूझ ही न रहा था.

“अरे, हद हो गई, कुछ भी नहीं सूझ रहा और दिन निकला जा रहा है,” सियार ने कहा.

“अब तो हिरण बैंक से वापस भी आ गया होगा,” भेड़िये ने कहा. हिरण ‘अपना बैंक’ में काम करता था.

“अरे हां, वह तो बैंक में काम करता है. क्यों न हम फोन कर उसे कहें कि  आज रात हम ‘अपना बैंक’ लूटने वाले हैं. उसके होश उड़ जायेंगे, फिर देखना कैसे यहाँ से वहां भागेगा. मज़ा आ जायेगा.”

रात आठ बजे दोनों ने एक पब्लिक फोन से हिरण को फोन किया. सियार ने अपनी आवाज़ बदल कर कहा, “मेरा नाम गब्बर सिंह है, आज रात मैं ‘अपना बैंक’ लूटने वाला हूँ. अगर तुम ने यह बात किसी को बताई तो मैं तुम्हें मार डालूँगा.’

जैसा सियार और भेड़िये ने सोचा था वैसा ही हुआ. हिरण के होश उड़ गये. उसे समझ ही न आया कि पुलिस को सुचना दे या  फिर अपने मैनेजर को यह बात बताये.
उसकी पत्नी ने पूछा, “किस का फोन था? इतने घबराये हुए क्यों हो?”

हिरण ने झट से सारी बात बता दी. बात सुन कर उसकी पत्नी हंस पड़ी और बोली, “भूल गये आज पहली अप्रैल है. कोई तुम्हें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहा है, अप्रैल फूल. अगर कोई डाकू सच में बैंक लूटने की सोच रहा है तो वह फोन करके पहले ही क्यों बता देगा?”

“बात तो तुम सच कह रही हो. मैं यूहीं डर रहा हूँ,” हिरण ने कहा और खाना खाने बैठ गया.


रात दस बजे के आस-पास हिरण को थोड़ी उलझन होने लगी. उसने सोचा अगर बैंक में सच में चोरी हो गई तो दोष उस पर भी आयेगा. उसने पत्नी से कहा, “एक बार बैंक का चक्कर लगा ही आता हूँ. सब ठीक ही होगा पर देख कर तसल्ली हो जायगी.”