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Tuesday, 1 March 2016

 “यह कैसा आदेश”
अचरज वन के बीचों-बीच एक झील थी. झील में कई प्रकार की मछलियाँ थीं. झील के किनारे बगुले भी रहते थे. बगुले झील की मछलियों का शिकार करते थे और उन मछलियों को बड़े चाव से खाते थे.
एक दिन कई बगुले झील के किनारे इकट्ठे हो रखे थे. सब ने पेट भर कर मछलियाँ खाने का मन बना रखा था. सब चुपचाप झील किनारे खड़े, एकटक पानी की ओर देख रहे था. जैसे ही कोई मछली किनारे के निकट दिखाई देती, कोई न कोई बगुला उसे पकड कर चट कर जाता.
तभी रिंकू बन्दर वहां आया. वह बहुत ही शरारती था. अन्य पशुओं को तंग करने में उसे बड़ा मज़ा आता.
उसने बगुलों को धमका कर कहा, ‘यह क्या कर रहे हो तुम लोग?’
बगुले सहम गये और एक दूसरे का मुंह ताकने लगे. बीगू बागुला सबसे बुद्धिमान था. उसने धीमे से कहा, ‘हम सब अपना पेट भर रहे हैं. तुम ज़रा चुप रहो नहीं तो मछलियाँ भाग जायेंगी.’
‘क्या तुम जानते नहीं कि इस झील में मछलियाँ पकड़ना मना है?’ बन्दर ने अकड़ते हुए कहा.
‘क्यों?’ बगुले ने पूछा.
‘क्योंकि यह वनराज का आदेश है.’
‘यह कैसा आदेश है? अगर हम मछलियां नहीं पकड़ेंगे तो खायेंगे क्या?’
‘मैं कुछ नहीं जानता. बस, तुम सब को इस आदेश का पालन करना होगा. ऐसा न करोगे तो सज़ा मिलेगी, हर एक को.’ बन्दर ऐसे बोल रहा था जैसे कि वह स्वयं ही वन का राजा हो.
बीगू ने अपने साथियों से कहा, ‘हमें राजा के पास जाना होगा. हम उनसे पूछेंगे कि अगर हम मछलियाँ नहीं पकड़ेंगे तो खायेंगे क्या.’
‘मेरी मानो तो वनराज के सामने इन मछलियों की बात भी न करना,’ बन्दर ने कहा.
‘क्यों?’
‘एक दिन वनराज इस झील में पानी पी रहे थे. एक मछली ने उनकी नाक काट खायी. अपमान और गुस्से से वो आग-बबूला हो गये. उन्होंने उस शैतान मछली को सज़ा देने का फैसला कर लिया.’
‘फिर क्या हुआ?’
‘कोई भी उस शैतान मछली को पकड़ कर उनके सामने न ला पाया. बस, वनराज ने आदेश दे दिया कि जब तक वह बदमाश मछली पकड़ी नहीं जाती कोई भी झील की मछलियों का शिकार न करेगा.’
बन्दर की बात सुन कुछ बगुले हंसने लगे. एक बगुले ने कहा, ‘यह तो कमाल हो गया, एक छोटी सी मछली ने जंगल के राजा की नाक कट खायी और हमारे बहादुर राजा कुछ न कर पाये.’
‘तुम वनराज का मज़ाक उड़ा रहे हो? इतना साहस?’ बन्दर ने आँखें दिखाते हुए कहा.
बीगू बगुले ने सब बगुलों को झिड़क कर कहा, ‘चुप हो जाओ और हंसना बंद करो. अब यह सोचो कि अगर हम ने मछलियाँ नहीं पकड़ीं तो हम क्या खायेंगे.’
‘हम क्या कर सकते हैं? हमें इस वन से कहीं ओर जाना होगा.’
बन्दर उन सब की रोनी सूरत देख कर मन ही मन बहुत खुश हो रहा था. पर उसने बड़ी गंभीरता से कहा, ‘भाइयो, मैं चलता हूँ पर तुम सब राजा के आदेश का पूरा-पूरा पालन करना.’
कुछ समय बाद शंकर हाथी पानी पीने आया. उसने देखा सब बगुले झील के किनारे से दूर एक जगह इकट्ठे थे. सब चुपचाप थे और थोड़ा चिंतित दिखाई दे रहे थे.
‘क्या बात है, आज मछलियाँ नहीं पकड़ रहे, क्या भूख हड़ताल पर हो?’ हाथी ने पूछा.
‘नहीं दादा, हम तो बस राजा के आदेश का पालन कर रहे हैं,’ बीगू ने कहा.
‘कैसा आदेश?’ हाथी ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा.
बीगू ने सारी बात बतायी. उसकी बात सुन हाथी हंसने लगा. ‘तुम सब बहुत भोले हो. उस शरारती बन्दर ने तुम सब को मूर्ख बनाया है. बीगू, तुम तो जानते ही हो कि वह बन्दर कितना शैतान है. वनराज ने कोई आदेश नहीं दिया है.’
(कहानी अभी बाकि है) 

Monday, 22 February 2016

वनदेवी का क्रोध
एक समय की बात है. अचरज वन में बुद्धिमान सिंह राज करता था. वह जंगल के सब पशुओं से प्यार करता था. हर पशु का पूरा ध्यान रखता था. सारे पशु भी शेर का बहुत सम्मान करते थे.
अचानक एक दिन बुद्धिमान सिंह बीमार हो गया. सब ने उसकी खूब सेवा की, पर उसे बचा न पाये. उसकी मृत्यु हो गई.
सब को बहुत दुःख हुआ. परन्तु चिंता का विषय यह था कि राजा किसे बनाया जाये.
बुद्धिमान सिंह का एक बेटा था, नाम था घुम्मकड़ सिंह. उसे घूमना-फिरना बहुत अच्छा लगता था. जिस समय उसके पिता की मृत्यु हुई उस समय भी वह कहीं सैर-सपाटा करने गया हुआ था. उसे गये हुए तीन माह हो चुके थे. कोई न जानता था कि वह कहाँ था और कब लौट कर आयेगा.
पशुओं ने एक सभा बुलाई. हाथी ने सब से कहा, ‘जंगल के कानून के अनुसार तो घुम्मकड़ को ही राजा बनाना चाहिये. परन्तु कोई नहीं जानता कि वह कहाँ है. ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिये?’
सियार ने झट से कहा, ‘हाथी को ही राजा बना दिया जाये. वह सब से समझदार है, सबसे शक्तिशाली है.’
लोमड़ ने तुरंत सियार की बात का समर्थन किया.
वह दोनों धूर्त थे. वह जानते थे कि हाथी सीधा-साधा पशु था.  अगर वह राजा बन गया तो वह दोनों उसके भोलेपन का लाभ उठा कर खूब मनमानी कर सकते थे.
भालू ने कहा, ‘हम कानून नहीं तोड़ सकते. किसी शेर को ही जंगल का राजा बनाया जा सकता है. हाथी को राजा बनाना गलत होगा.’
सियार ने कहा, ‘आप बिलकुल सही कह रहे हैं. हमें कानून नहीं तोड़ना चाहिये. पर जब तक घुम्मकड़ सिंह लौट नहीं आता तब तक किसी न किसी को तो राजपाट चलाना ही होगा.’
लोमड़ ने कहा, ‘राजा के बिना अगर कोई गड़बड़ हो गई तो हम सब क्या करेंगे?’
गैंडे ने कहा, ‘राजा तो होना ही चाहिये. तभी तो सब पशु कानून का पालन करंगे.’
भेड़िये ने कहा, ‘चुनाव कर लेते हैं, अब तो कई वनों में चुनाव से ही राजा चुना जाता है.’
सियार और लोमड़ एक साथ बोले, ‘हमारा प्रस्ताव है कि हाथी को इस वन राजा बनाया जाये. जो पशु इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं वह अपना हाथ उठायें.’
उनकी बात सुन कर सब पशु एक-दूसरे की ओर देखने लगे. लोमड़ और सियार को छोड़ किसी ने अपना हाथ न उठाया.
फिर दो-चार पशुओं ने अपने-अपने हाथ उठा दिए. उनको देख कर कुछ और पशुओं ने भी हाथ उठा दिए. देखते ही देखते लगभग सबने हाथ उठा दिए.
सियार ने खुशी से चिल्ला कर कहा, ‘सबके समर्थन से हाथी को इस वन का राजा बना दिया जाता है.’
हाथी जंगल का राजा बन गया.
सियार और लोमड़ अपनी चतुराई पर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए. दोनों हाथी के आस-पास ही मंडराने लगे. अवसर मिलते ही उसकी चापलूसी करते. अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से हाथी का मन मोह लेने की कोशिश करते.
हाथी सीधा-साधा तो था पर मूर्ख नहीं था. वो जानता था कि सियार और लोमड़ धूर्त थे. दोनों उसका मन जीत कर जंगल पर अपना दबदबा बनाना चाहते थे. हाथी ने भालू से इस विषय में बात की. भालू ने कहा, ‘सियार और लोमड़ थोड़े चालाक हैं पर इतने बुरे पशु नहीं हैं.’
‘अरे, अवसर मिलते ही यह सब पर अपनी मनमानी करने लगेंगे. तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा क्या? तो मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं कुछ समय के लिए ऐसा व्यवहार करूंगा कि जैसे मैं इनकी बातों में आ गया हूँ. मेरे ऐसा दिखाते ही दोनों का व्यवहार बदल जायेगा. बस तुम दोनों पर होशियारी से अपनी नज़र रखना.’
वैसा ही हुआ जैसा हाथी ने सोचा था. जब सियार और लोमड़ को लगा कि हाथी उन पर विश्वास करने लगा था तो दोनों अन्य पशुओं के साथ बुरा व्यवहार करने लगे. किसी की पिटाई कर देते, किसी से कोई वस्तु छीन लेते, किसी को धमकाते कि वनराज से उसकी झूठी शिकायत कर देंगे.
सब जानते थे कि हाथी की सियार और लोमड़ से अच्छी मित्रता थी, इसलिये कोई भी उन दुष्टों की शिकायत करने का साहस न कर पाया.
भालू सब देख. उसने हाथी को सारी बात बता दी.
‘मैंने कहा था न कि यह दोनों धूर्त हैं. अब मैं इन्हें ऐसा सबक सिखाउंगा कि यह दोनों इस वन से ही भाग जायेंगे,’ हाथी ने थोड़ा गुस्से से कहा.
अगले दिन जब सियार और लोमड़ हाथी से मिलने आये तो हाथी ने कहा, ‘अरे तुम दोनों का क्या होगा?’
दोनों थोड़ा घबरा गये. सियार ने पूछा, ‘क्या हुआ महाराज, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’
‘कल रात वनदेवी मेरे सपने में आईं. बहुत गुस्से में थीं, बोलीं कि मैंने राजा बन कर जंगल का कानून तोड़ दिया है. इस कारण मेरे सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे. मैंने कहा कि मैं अपनी इच्छा से राजा नहीं बना. मुझे तो सियार और लोमड़ ने ज़बरदस्ती राजा बना दिया है. इस पर वनदेवी ने कहा कि जिसने भी हाथी को राजा बनाया है उसके सिर के टुकड़े हो जायेंगे.’
सियार और लोमड़ के होश उड़ गये. सियार ने कहा, ‘आप तो सब के समर्थन से राजा बने. सब चाहते थे कि आप राजा बने.’
‘मैंने भी यही बात वनदेवी से कही थी. वह बोलीं कि प्रस्ताव किसने रखा था. मुझे बताना पड़ा कि प्रस्ताव तो तुम दोनों ने ही रखा था. बस, वनदेवी ने गुस्से में कह दिया कि जिसने भी मुझे राजा बनाने का प्रस्ताव रखा था उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे.’
हाथी की बात सुन सियार और लोमड़ की डर से घिग्घी बंद हो गई.
‘अब हमारा क्या होगा?’ सियार ने कहा.
‘मुझे भी तुम्हारी बहुत चिंता हुई. मैंने वनदेवी से कहा कि तुम दोनों को क्षमा कर दे.’ हाथी ने कहा.
‘वनदेवी ने क्या कहा?’ लोमड़ ने पूछा.
‘वनदेवी तो बहुत गुस्सा थीं. पर मैंने भी बार-बार विनती की तो बोली, “अगर वह दोनों घुम्मकड़ सिंह को ढूंढॅ कर ले आते हैं और उसे जंगल का राजा बना देते हैं तो मैं उनको क्षमा कर दूंगी.” मैंने वनदेवी से तुरंत कह दिया कि तुम दोनों घुम्मकड़ सिंह को अवश्य ढूंढॅ कर ले आओगे’
हाथी कि बात सुन सियार और लोमड़ की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई.
‘महाराज, कोई नहीं जानता कि घुम्मकड़ सिंह कहाँ गये हैं. हम उन्हें ढूँढने कहाँ जाएँ,’ सियार ने कहा.
‘अब मैं क्या बताऊं, वनदेवी ने कहा है कि अगर तुम आज सूर्य अस्त होने से पहले घुम्मकड़ सिंह  को खोजने नहीं गये तो तुम दोनों के सिरों के टुकड़े हो जायेंगे. मेरी मानो तो तुम दोनों अभी निकल पड़ो नहीं तो तुम्हारा अंत निश्चित है.’
सियार ने लोमड़ की ओर देखते हुए कहा, ‘भइया, निकल चलो. अगर घुम्मकड़ सिंह नहीं मिले तो किसी दूसरे वन में आसरा ढूंढने की कोशिश करेंगे.’
उनके जाते ही भालू ने हाथी से पूछा, ‘क्या सच मैं वनदेवी सपने में आई थीं?’
‘अरे नहीं, मैं जानता था कि यह दोनों बड़े अन्धविश्वासी हैं. बस इसी बात का लाभ उठा कर इन्हें एक मनगढंत कहानी सुना दी और देखो, दोनों दुष्टों से हम सब को छुटकारा मिल गया.’

‘इन दुष्टों ने सब की नाक में दम कर रखा था. इन के साथ ऐसा ही व्यवहार करना उचित था.’
© आइ बी अरोड़ा 

Friday, 12 February 2016

हाथी की दुकान
इक हाथी ने खोली दुकान
करने लगा वह भी कुछ काम
माल बहुत सा ले आया
सब को फिर संदेशा भिजवाया
“सामान सभी है मेरा अच्छा
सबसे बढ़िया सबसे सस्ता
झटपट न ले जाओगे
तो घाटे में रह जाओगे”
 पर कोई न आया लेने सामान
बैठे-बैठे बस हो गयी शाम
हाथी बहुत ही झुंझलाया
सब पर वह चीखा चिल्लाया
हल्ला सुन सिंह दौड़ा आया
हाथी पर उस को गुस्सा आया
सिंह ने खींचे हाथी के कान
बंद हो गई हाथी की दुकान.
© आइ बी अरोड़ा


Tuesday, 26 May 2015

अधुरा सपना

पर्शिया (फ़ारस) के राजा डेरियस (दारा) को हरा कर सिकंदर ने भारत की ओर बढ़ने का निर्णय लिया.

अपने सेनिकों से उसने कहा, “मित्रों, अब तक यहाँ के लोगों ने हमें सिर्फ अपने सपनों में ही देखा था, लेकिन हमारा सामना पहली बार किया था. अगर हम यहाँ से ही लौट जाते हैं तो यह लोग हमें कायर और डरपोक समझेंगे और हम पर टूट पड़ेंगे. फिर भी अगर कोई सैनिक यूनान लौट जाना चाहता है तो लौट सकता है. लेकिन स्मरण रहे, विश्व-विजय पर निकले अपने राजा का साथ छोड़ने वाले सैनिकों पर देवता अवश्य नाराज़ होंगे.”

सिकन्दर की बातों का यूनानियों पर इतना प्रभाव पड़ा कि सब सैनिक एक साथ चिल्लाये, “हम सब आपके साथ हैं. आपके साथ विश्व के दूसरे छोर तक जाने को हम तैयार हैं.”

सेना कूच के लिए तैयार थी. सिकन्दर ने देखा कि सभी सैनिकों ने लूट का बहुत सारा सामान इकट्ठा कर रखा था. सामान गाड़ियों और खच्चरों पर लदा था. इतने सामान के साथ आगे बढ़ना कठिन लग रहा था.

सिकंदर ने अपना और अपने मित्रों का सामान एक जगह इकट्ठा करवा दिया. सारे सैनिक उत्सुकता से देख रहे थे. उसने आदेश दिया, “इस सामान को आग लगा दो.”

सारी सेना स्तब्ध सी देखती रही. सिकंदर और उसके मित्रों का सामान जलने लगा.

सिकंदर ने सैनिकों से कहा, “आवश्यक सामान रख कर बाकि सब जला डालो.”

अपने राजा के व्यवहार से प्रभावित हो,  सैनिकों ने अपना सारा अनावश्यक सामान खुशी से चीखते-चिल्लाते हुए जला डाला. तब यूनानी सेना भारत की ओर चल दी. 

भारत में तक्षशिला के राजा अम्बी से यूनानियों का सामना हुआ. तक्षशिला एक विशाल राज्य था. धरती उपजाऊ थी, अच्छी चरागाहें थीं, राज्य सम्पन्न था.

परन्तु अम्बी ने युद्ध न किया. सिकंदर से मित्रता करने वह यूनानियों के शिविर में आया. उसने कहा, “राजन, अगर आप हमारा दाना-पानी छीनने नहीं आये तो हम आपस में युद्ध क्यों करें? रही धन की बात, अगर हम आपसे अधिक धनी हैं तो अपना धन आप के साथ बांटने को तैयार हैं. और अगर आपका धन-भंडार अधिक बड़ा है तो आपके धन का भागीदार होने में हमें कोई आपत्ति नहीं.”

सिकंदर ने प्रसन्न हो कर कहा, “अगर आप सोचते हैं कि अपनी विनम्रता के कारण हमसे मुकाबला करने से बच जायेंगे तो आप गलत सोच रहे हैं. हम आप से अवश्य मुकाबला करेंगे, परन्तु हमारा मुकाबला उपहारों के लेन-देन का होगा.”

दोनों ने एक-दूसरे को बहुमूल्य उपहार दिए. अम्बी की भांति कई और राजाओं ने सिकंदर के साथ युद्ध करने के बजाय यूनानियों की अधीनता स्वीकार कर ली. इन राजाओं की सहायता से सिकन्दर ने तक्षशिला के आस-पास का सारा क्षेत्र जीत लिया.

अब सिकंदर ने पुरु (पोरस) को अपने शिविर में आमंत्रित किया. पुरु का राज्य झेह्लम नदी के पूर्वी तट पर था. पुरु ने उत्तर भिजवाया कि सिकंदर से उसकी भेंट अवश्य होगी. परन्तु यह भेंट यूनानी शिविर में नहीं, युद्ध के मैदान में होगी.

अभी तक किसी भी शक्तिशाली भारतीय राजा के साथ यूनानियों को युद्ध न करना पड़ा था. परन्तु पुरु के साथ युद्ध किये बिना आगे बढ़ना संभव न था. पुरु ने अपनी सेना नदी के पूर्वी तट पर इकट्ठी कर रखी थी. सेना में हाथी भी थी जो एक दीवार के समान नदी तट पर खड़े थे.

पुरु के सेना किसी भी आक्रमण के लिए तैयार थी. नदी पार करना असंभव लग रहा था. एक गतिरोध पैदा हो गया था.

सिकंदर ने सैनिकों को आदेश दिया कि  वह खूब शोर मचाएं. शोर सुन, पुरु की सेना समझी कि यूनानी सेना नदी पार करने का प्रयास कर रही है. पुरु के सेना सावधान हो गई. परन्तु कोई भी नदी पार न आया. यूनानी बस शोर मचाते रहे, नदी पार करने का कोई प्रयास उन्होंने नहीं किया. पुरु की सेना ढीली पड़ गई. उनकी सतर्कता कम हो गई. इस असावधानी का लाभ उठा, यूनानी चकमा देने में सफल हो गये.

अँधेरी और तूफानी रात में कुछ घुड़सवारों और पैदल सिपाहियों को साथ ले, सिकन्दर अपनी शिविर से दूर जाकर नदी पार करने का प्रयास करने लगा. वर्षा हो रही थी, बिजली चमक रही थी, नदी में बाढ़ आई हुई थी. बिना घबराये, यूनानी पानी में आगे बढ़ते रहे. कुछ सैनिक नदी की तेज़ धारा में बह भी गये. परन्तु सिकंदर और बाकि सैनिक नदी पार जाने में सफल हो गये.

नदी का पूर्वी तट कीचड़ से भरा था. यूनानी कीचड़ में फंस गये. तब सिकंदर ने चिल्ला कर कहा, “मित्रो, देखो तुम्हें यश और कीर्ति दिलाने के लिए मुझे कैसे-कैसे खतरों से गुज़रना पड़ता है.”

यूनानी उत्साह से भर गये. जो सैनिक नावों में सवार थे वह भी नदी में कूद गये. पूरी ताकत लगा कर वह नदी पार कर गये और पुरु की सेना की ओर चल दिए. योजना थी कि अगर पुरु की सेना आ जाती है तो उसे तब तक रोका जाये जब तक सारी यूनानी सेना नदी पार नहीं कर लेती.

पुरु को संदेह हुआ कि यूनानी नदी पार कर रहे हैं. एक हज़ार घुड़सवार और साठ रथों की एक टुकड़ी उसने यूनानियों को रोकने के लिए भेजी. यूनानी तैयार थे. घमासान लड़ाई हुई. पुरु के सैनिक हार गये और अपने रथ भी खो बैठे. पुरु समझ गया कि शत्रु सेना नदी पार करने में सफल हो गई है. उसने अपनी सारी सेना को यूनानी सेना की ओर मोड़ दिया.

पुरु की सेना के आगे-आगे सुसज्जित हाथी चल रहे थे. पुरु स्वयं भी एक विशाल हाथी पर बैठा था. इस सेना का सीधा सामना करने के बजाय, दायें और बायें से हमला करने का निर्णय सिकन्दर ने लिया. एक सेनापति  दायें ओर से पुरु की सेना पर टूट पड़ा, सिकंदर ने बायें ओर से आक्रमण किया. इस दुतरफा हमले से पुरु की सेना में भगदड़ मच गई. हाथी घबरा कर पीछे हटने लगे और अपने ही सैनिकों को रोंदने लगे. परन्तु इस अफरा-तफरी में भी एक भीषण युद्ध हुआ.

अपने हाथी पर बैठा पुरु अपनी सेना का संचालन कर रहा था. हाथी बड़ी सूझबूझ से अपने राजा को शत्रुओं के हमले से बचा रहा था और शत्रुओं को खदेड़ भी रहा था. पुरु बड़ी वीरता से लड़ रहा था. बाणों की वर्षा से वह बुरी तरह घायल हो गया था. ऐसा लग रहा था कि वह हाथी से गिर पड़ेगा. पर तभी हाथी संभल कर नीचे बैठ गया. पुरु उतर कर धरती पर आ गया. हाथी अपनी सूंड से राजा के शरीर में चुभे तीर खींच-खींच कर निकालने लगा.

यूनानियों ने पुरु को घेर लिया. पुरु की सेना हार गई. पुरु बंधी बना लिया गया. उसकी वीरता ने सिकन्दर को बहुत प्रभावित किया था. उसने पुरु से पूछा, “आपके साथ कैसा व्यवहार किया जाये?”

“जैसा एक राजा के साथ होना चाहिये,” पुरु ने निडरता से कहा.

सिकंदर आश्चर्यचकित हो गया, “आप कोई अन्य निवेदन नहीं करना चाहते क्या?”

“नहीं,” पुरु ने गर्व के साथ कहा.

“आप सचमुच एक महान वीर हैं.” ऐसा कह सिकंदर ने पुरु को उसका राज्य लौटा दिया.

इस भीषण युद्ध ने यूनानियों को हतोत्साहित कर दिया. उन्होंने आगे जाने से इनकार कर दिया. सिकन्दर बहुत निराश हुआ पर उसे वापस लौटने का निर्णय लेना ही पड़ा. भारत विजय का उसका सपना अधुरा ही रह गया.

(प्लूटार्क के वर्णन से प्रेरित)
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© आई बी अरोड़ा 

सिकंदर से सम्बंधित कहानियां  
                 ‘दस प्रश्न
                       ‘मृत्यु निश्चित थी

Wednesday, 14 January 2015

मूर्ख बन्दर
इक बन्दर था हाथी से चिढ़ता
हर दम था वह हाथी से लड़ता
“माना तुम हो शक्तिशाली
पर मेरी भी है बात निराली

तुम से छोटा हूँ तो क्या
वन में मुझ सा है कौन भला
जो चाहूँ वह मैं कर जाऊं
इस वन का राजा भी बन जाऊं”

हाथी सुन कर थोड़ा झुंझलाया
सिर अपना उसने खुजलाया
“यह सब मुझ से क्यों हो कहते
अच्छा लगता तुम राजा बनते 

सिंह से कहता हूँ यह बात 
नहीं टालते वह मेरी बात 
सिंहासन से हट जायेंग 
दिन तुम्हारे फिर जायेंगे”



 मूर्ख बन्दर अब घबराया
सिंह को अपने पीछे ही पाया   
गुस्से से थीं उसकी आँखें लाल
 डर से बन्दर हुआ बेहाल

बोल गया था वो ऊंचे बोल
मन हुआ अब डांवांडोल
हाथ पाँव उसके लगे कांपने
सिंह को पाया जब सामने.

© आई बी अरोड़ा 

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