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Wednesday, 1 April 2015


अप्रैल फूल
(अंतिम भाग)
(कहानी का पहला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं)


बैंक के निकट उसने एक गाड़ी खड़ी थी. बैंक का दरवाज़ा खुला था. उसका माथा ठनका. वह सावधानी के साथ आगे आया. बैंक का चोकीदार दरवाज़े के पास लेटा था. वह बेहोश था. बैंक के अंदर एक चोर था. उसने अपने चेहरे को एक नकाब से छिपा रखा था. बैंक की तिजोरी खुली थी. चोर एक बैग में रुपये रख रहा था.

हिरण ने सोचा कि उसे पुलिस को सूचना देनी चाहिये. परन्तु जल्दबाज़ी में वह अपना सेल फोन घर ही छोड़ आया था. पुलिस स्टेशन अधिक दूर न था. वह पुलिस स्टेशन की और भागा.

तभी उसने देखा कि जहां पर चोर ने अपनी गाड़ी खड़ी कर रखी थी वहीं सड़क में एक मैनहोल था. कुछ सोच कर उसने मैनहोल का ढक्कन उठा कर एक ओर रख दिया और अँधेरे में छिप कर चोर की प्रतीक्षा करने लगा.

उसे ज़्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. थोड़े समय बाद ही चोर रुपयों से भरा बैग लेकर बैंक से बाहर आया. उसने चारों ओर देखा. उसे कोई दिखाई न दिया. वह बड़ी होशियारी के साथ अपनी गाड़ी की ओर चल दिया.

तभी हिरण ज़ोर से चिल्लाया, “चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो”

हिरण की चीख पुकार सुन, चोर घबरा गया और अपनी गाड़ी की ओर भागा. परन्तु हड़बड़ाहट में उसने देखा ही नहीं की रास्ते में एक बिना ढक्कन का मैनहोल. चोर सीधा मैनहोल में जा गिरा. रुपयों से भरा बैग उसके हाथ से छूट कर सड़क के एक ओर जा गिरा.

हिरण ने तुरंत बैग उठाया और पुलिस स्टेशन की ओर भागा. वहां उसने पुलिस इंस्पेक्टर को सारी बात बताई. वहीं से उसने अपने मैनेजर  को भी फोन किया और घटना की जानकारी दे दी.

दो सिपाहियों के साथ इंस्पेक्टर बैंक की ओर चल दिया. चोर अभी भी मैनहोल के अंदर था. गिरते समय उसके पैर में चोट लग गई थी और वह करहा रहा था. सिपाहियों ने उसे बाहर निकाला. उसके चेहरे से नकाब हटाई. वह तो लोमड़ था.

“अरे, इस बदमाश को तो हम एक साल से ढूंढ रहे हैं, इस पर तो दस हज़ार का इनाम भी है. हिरण भाई, आज तो आपने कमाल कर दिया. जिसे अपराधी को हम इतने दिनों तक नहीं पकड़ पाये उसे आपने अपनी सूझबूझ से पकड़वा दिया. आपको तो पुरस्कार मिलेगा,” इंस्पेक्टर ने कहा. 

इस बीच बैंक मैनेजर भी आ पहुंचा था. उसने भी हिरण की प्रशंसा की और कहा, “बैंक की ओर से भी आपको पुरस्कार दिया जाएगा.”

हिरण घर लौटा. सियार और भेड़िया खिड़की के निकट बैठे उसके लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे. उसे आता देख सियार ने कहा, “क्या आज कल रात में भी बैंक में काम होता है?”

“अरे, आज तो मैंने अकेले ही बैंक को लुटने से बचा लिया. लोमड़ बैंक में चोरी करने आया था. वह पकड़ा गया. सरकार से मुझे दस हज़ार का पुरस्कार मिलेगा. बैंक से भी पुरस्कार मिलेगा.” हिरण एक हीरो की तरह मुस्कुरा रहा था.

सियार और भेड़िये की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी. वह तो उसे मूर्ख बन रहे थे, और वह हीरो बन गया था.

“ भाई, यह तो हम ही अप्रैल फूल बन गये,” सियार ने कहा.

भेड़िया क्या कहता, वह तो खुद ही दुःखी था.
*************

© आई बी अरोड़ा



Tuesday, 31 March 2015

अप्रैल फूल
(पहला भाग)

मार्च का अंतिम दिन था. भेड़िये ने सियार से कहा, “अरे यार, कल किस सज्जन को मूर्ख बनाया जाये.”

“कल क्या ख़ास बात है?” सियार ने पूछा.

“भूल गये? कल पहली अप्रैल है. हर वर्ष पहली अप्रैल के दिन हम किसी न किसी को मूर्ख बनाते ही हैं.”

दोनों किसी को मूर्ख बनाने की योजना बनाने लगे. तभी उन्होंने खिड़की से हिरण को अपने घर जाते हुए देखा.

“क्यों न इसे मूर्ख बनाया जाये?” सियार ने हिरण की ओर संकेत करते हुए कहा.

“हां, यह बड़ा ही भोला-भाला प्राणी है. इसे तो सरलता से मूर्ख बना सकते हैं,” भेड़िये ने कहा.

अगले दिन सियार और भेड़िया मिल कर अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ने लगे. परन्तु हिरण को कैसे मूर्ख बनाया जाये, उन्हें सूझ ही न रहा था.

“अरे, हद हो गई, कुछ भी नहीं सूझ रहा और दिन निकला जा रहा है,” सियार ने कहा.

“अब तो हिरण बैंक से वापस भी आ गया होगा,” भेड़िये ने कहा. हिरण ‘अपना बैंक’ में काम करता था.

“अरे हां, वह तो बैंक में काम करता है. क्यों न हम फोन कर उसे कहें कि  आज रात हम ‘अपना बैंक’ लूटने वाले हैं. उसके होश उड़ जायेंगे, फिर देखना कैसे यहाँ से वहां भागेगा. मज़ा आ जायेगा.”

रात आठ बजे दोनों ने एक पब्लिक फोन से हिरण को फोन किया. सियार ने अपनी आवाज़ बदल कर कहा, “मेरा नाम गब्बर सिंह है, आज रात मैं ‘अपना बैंक’ लूटने वाला हूँ. अगर तुम ने यह बात किसी को बताई तो मैं तुम्हें मार डालूँगा.’

जैसा सियार और भेड़िये ने सोचा था वैसा ही हुआ. हिरण के होश उड़ गये. उसे समझ ही न आया कि पुलिस को सुचना दे या  फिर अपने मैनेजर को यह बात बताये.
उसकी पत्नी ने पूछा, “किस का फोन था? इतने घबराये हुए क्यों हो?”

हिरण ने झट से सारी बात बता दी. बात सुन कर उसकी पत्नी हंस पड़ी और बोली, “भूल गये आज पहली अप्रैल है. कोई तुम्हें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहा है, अप्रैल फूल. अगर कोई डाकू सच में बैंक लूटने की सोच रहा है तो वह फोन करके पहले ही क्यों बता देगा?”

“बात तो तुम सच कह रही हो. मैं यूहीं डर रहा हूँ,” हिरण ने कहा और खाना खाने बैठ गया.


रात दस बजे के आस-पास हिरण को थोड़ी उलझन होने लगी. उसने सोचा अगर बैंक में सच में चोरी हो गई तो दोष उस पर भी आयेगा. उसने पत्नी से कहा, “एक बार बैंक का चक्कर लगा ही आता हूँ. सब ठीक ही होगा पर देख कर तसल्ली हो जायगी.”

Friday, 20 February 2015


शाम का समय
(अंतिम भाग)

(कहानी का पहला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं)


“डॉक्टर भालू, आपकी डिग्री हमारे पास है. यह डिग्री हमें स्टेशन के निकट मिली थी. डिग्री लौटाने के लिए हम आपसे कब मिल सकते हैं?”
“अपना पता बताओ, मैं अभी आकर डिग्री ले जाऊंगा. पुरस्कार की राशि भी तुम्हें दे दूंगा,” भालू ने कहा.
“नहीं आपको कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है. आप अपना पता बता दें. हम ही आकर डिग्री दे जायेंगे,” सियार ने कहा. सियार और भेड़िया किसी को भी अपने अड्डे का पता बताना नहीं चाहते थे.
“ठीक है, तुम लोग कल दो बजे आ जाना. पर मेरी डिग्री संभाल कर रखना. अगर मेरी डिग्री को कुछ हो गया तो बड़ी मुसीबत हो जायेगी.” भालू ने अपना पता सियार को बता दिया.
अगले दिन दोनों डिग्री लेकर भालू के बताये पते पर पहुँच गये.
उन्हें देख कर भालू ने कहा, “ मेरी डिग्री तुम्हारे पास है? लाओ, मेरी डिग्री मुझे दे दो. डिग्री को लेकर मैं बहुत चिंतित हूँ. घबराहट के मारे दो रात से मैं सो भी नहीं पाया.”
“डिग्री हमारे पास है, अगर पुरस्कार की राशि हमें मिल जाती तो डिग्री भी आपको दे देंगे,” सियार ने कहा.
सियार की बात सुन डॉक्टर भालू ने कहा, “भीतर आ जाओ. मैंने पुरस्कार के रूपए पहले ही निकाल कर रखे हुए हैं. रूपए ले कर मेरी डिग्री मुझे दे दो.”
दोनों चोर घर के भीतर आ गये. उन्हें रुपयों का बंडल दिखाते हुए भालू ने पूछा, “मेरा सूटकेस भी तुम्हारे पास होगा?”
सियार और भेड़िये को झटका लगा. सियार ने भेड़िये को आँखों से संकेत किया कि वह कुछ न कहे.
“कौन सा सूटकेस? क्या कह रहे हो तुम?” सियार ने पूछा.
“हमारे पास कोई सूटकेस नहीं है,” भेड़िया चुप न रह सका.
तभी इंस्पेक्टर होशियार सिंह भी वहां आ पहुंचा. इंस्पेक्टर को देख सियार और भेड़िये की टांगें कांपने लगीं.
इंस्पेक्टर ने आते ही कहा, “अगर भालू की डिग्री तुम्हारे पास है तो उसका सूटकेस भी तुम्हारे होना चाहिये. और अगर सूटकेस तुम्हारे पास है तो उसमें रखे पचास हज़ार रुपये भी तुम लोगों के पास ही होने चाहिये.”
अब सियार का माथा ठनका. उसे तो भेड़िये पर पहले ही संदेह था. वह समझ गया कि भेड़िये ने उसके साथ धोखा किया था. उसने सूटकेस खोल कर उसमें रखे पचास हज़ार रूपए निकल कर अपने पास रख लिए थे. उसे गुस्सा आ गया और वह अपने को रोक न पाया. गुस्से हम हर किसी की मति भ्रष्ट हो जाती है. सियार की भी हो गयी और वह भारी भूल कर बैठा.
“तुम तो कह रहे थे की सूटकेस में कोई रूपये नहीं थे? और पचास हज़ार अपने   पास रख लिए. तुम ने मेरे साथ ही धोखा किया. क्यों?” सियार ने भड़क कर भेड़िये से कहा.
“यह सब झूठ है, सूटकेस में कोई रुपये नहीं थे. यह लोग हमें आपस में लड़वाना चाहते हैं. मैंने तुम्हें कोई धोखा नहीं दिया. इनकी बातों में मत आओ,” भेड़िये ने कहा.
“श्रीमान सियार जी, आपका दोस्त ठीक कह रहा है. सूटकेस में कोई रूपए नहीं थे. यह झूठ तो मैंने सच जानने के लिए बोला था. आप दोनों मेरी चाल में फंस गये, आप दोनों ने स्वयं स्वीकार कर लिया है की सूटकेस आप के पास है.” इंस्पेक्टर ने कहा.
सियार और भेड़िये के हाथों के तोते उड़ गये. मूर्खों की भांति दोनों एक-दूसरे का मुंह देखने लगे.
इंस्पेक्टर ने कहा, “डॉक्टर भालू अपने मित्र भोला से मिलने राज नगर गया था. वह कुछ दिन उसके घर में रहने वाला था. पर वहां पहुँच, गलती से अपना सूटकेस सड़क किनारे ही छोड़ आया.”
“बड़ी भूल हो गयी थी. मित्र को देख में इतना प्रसन्न हो गया कि बातों में मुझे ध्यान ही न रहा की मेरा सूटकेस तो भोला के घर के बाहर ही रह गया है. भोला भी मेरे साथ बातों में इतना मग्न हो गया कि उसे भी ध्यान न आया की मैं अपना सामान बाहर छोड़ आया हूँ.  और जब ध्यान आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सूटकेस गायब था. कोई उसे उठा कर ले गया था,” भालू ने कहा.
“भोला और भालू मेरे पास आये तो मैंने सोचा कि जिस चोर ने सूटकेस उठाया है उसे थोड़ा चालाकी से अपने जाल फांसना होगा. और देखो तुम दोनों मेरे जाल में फंस गये.” इतना कह इंस्पेक्टर खिलखिला कर हंस दिया.
सियार और भेड़िये के पास अब कोई उपाय न था. दोनों पकड़े गये. भालू को सूटकेस सहित अपना सारा सामान मिल गया.  

©आई बी अरोड़ा 

Friday, 5 December 2014

अंत भले का भला
भीमा भालू का स्वभाव ऐसा था कि बिना सोचे-समझे ही वह हर किसी की सहायता कर दिया करता था.
एक दिन भेड़िया आया और बोला, “भइया, सियार बहुत बीमार है. उसका इलाज कराने ले लिए पैसे भी नहीं हैं. अगर थोड़ी सहायता कर दो तो बड़ी मेहरबानी होगी.”
“पिछले माह तुमने अपने इलाज के लिए दो सौ रूपए लिए थे. वह रूपए तुमने अभी तक नहीं लौटाये.”
“भइया, मैं सारे पैसे लौटा दूंगा. बस आज मदद कर दो. इलाज न हुआ तो सियार मर जाएगा,”
भीमा का मन पसीज गया. उसने भेड़िये को सौ रूपए दी दिए.
कुछ दिन बाद भालू ने सियार को अपने घर के बाहर गिरा पाया. वह भाग कर आया और सियार से पूछा, “क्या हुआ?”
“दो दिन से कुछ नहीं खाया. घर में अनाज का एक दाना भी नहीं है. भूख से जान निकल रही है.”
भीमा सहारा दी कर सियार को अपने घर ले आया और उसे पेट भर खाना खिलाया.
चतुरलाल बंदर भीमा के स्वभाव से परिचित था. उसने भीमा से कहा, “भीमा, सोच-समझ कर किसी की सहायता किया करो. भेड़िया और सियार बार-बार तुम्हें बुद्धू बनाते हैं. झूठी कहानियां सुना कर तुम्हें ठगते हैं.”
“मैं क्या करूं, जब भी कोई मुझसे सहायता माँगता है मैं न नहीं कह पाता,” भीमा ने धीमे से कहा.
“ऐसे तो कभी न कभी तुम मुसीबत में फंस जाओगे,” बंदर ने समझाया.
एक शाम भीमा भालू घर पर था. किसी ने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया. भीमा ने दरवाज़ा खोला. बाहर भेड़िया और सियार थे. दोनों घबराये हुए थे. सियार बोला, “भइया, हमारी सहायता करो. पुलिस हमें ढूंढ रह है.”
“क्या हुआ? पुलिस तुम्हें क्यों ढूंढ रही है?” भीमा ने आश्चर्य से पूछा.
“इंस्पेक्टर होशियार सिंह समझता है कि हमनें बैंक लूटा है. पर हम निर्दोष हैं,” भेड़िये ने सुबकते हुए कहा.
“हम सच कह रहे हैं. हम ने कुछ नहीं किया. पर इंस्पेक्टर हमारी बात का विश्वास नहीं करेगा और हमें जेल में बंद कर देगा,” सियार ने कहा.
भीमा भालू उनकी बातों में आ गया. उसने दोनों को अपने घर में छिपा लिया. कुछ ही देर में इंस्पेक्टर वहां आ पहुंचा.
“सियार और भेड़िया इधर तो नहीं आये?” इंस्पेक्टर ने सवाल किया.
“बात क्या है?” भालू ने सीधा जवाब न दिया.
“बैंक में डाका पड़ा है. हमें संदेह है कि यह काम सियार और भेड़िये का है. हम उन्हें गिरफ्तार करने गये तो दोनों भागने में सफल हो गये. थोड़ा सतर्क रहना. अगर वह दिखाई दें तो तुरंत मुझे फोन करना,” इतना कह इंस्पेक्टर चल दिया.
भीमा भीतर आया तो उसने भेड़िये को फोन पर किसी से बात करते सुन लिया. भेड़िया कह रहा था, “आज कुछ न करेंगे. आज पुलिस बहुत चौकस है. तुम चिंता न करो, रूपए ऐसी जगह संभाल कर रख दिए हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता. कल रात भीमा के घर के पीछे मिलना.”
भीमा के कान खड़े हो गये. उसने मन ही मन कहा, “कुछ गड़बड़ तो है.”
उसने सियार और भेड़िये से कहा, “मैंने इंस्पेक्टर को समझा दिया है वह तुम को तंग न करेंगे. अब तुम अपने घर जाओ.”
उनके जाते ही भीमा अपने कमरे में टहलने लगा. खूब सोच विचार कर उसने इंस्पेक्टर को फोन किया, “कल रात आप मेरे घर आना, परन्तु सावधानी के साथ, किसी को पता न चल पाये मेरे घर के आसपास पुलिस है.”
“क्यों?” इंस्पेक्टर ने पूछा.
“आप को बैंक से लूटे रूपये और बैंक के लुटेरे दोनों मिल जायेंग.”
अगली रात इंस्पेक्टर चार सिपाहियों के साथ भीमा के घर आया. भीमा के कहने पर सब घर के पिछवाड़े आये और छिप कर प्रतीक्षा करने लगे. लगभग ग्यारह बजे सियार और भेड़िया आये. दोनों ने इधर उधर देखा. कोई दिखाई न दिया. दोनों भीमा के कार गैरज की ओर गये. सियार ने चाबी से गैरज का ताला खोला, भीतर गया और एक बैग लेकर बाहर आया.
तभी पुलिस ने उन दोनों को घेर लिया. उनके होश उड़ गये. इंस्पेक्टर ने बैग अपने कब्ज़े में ले लिया. बैग रुपयों से भरा था. इंस्पेक्टर ने दोनों को हथकड़ी लगा दी. दोनों को समझ ही न आया के यह सब कैसे हो गया. उन्होंने तो कहीं कोई सुराग छोड़ा ही न था.
इंस्पेक्टर ने भीमा से पूछा, “तुम्हें कैसे पता चला की रूपये तुम्हारे गैरज में छिपा कर रखे गये हैं?”
“पिछले सप्ताह यह दोनों मेरे पास आये थे. इन्होंने कहा था कि इनकी कार का टायर पंक्चर हो गया था. कार का टायर बदलना था पर जैक नहीं मिल रहा. मैंने गैरज से जैक निकाल कर दी दिया. तब सियार ने कहा कि टायर बदल कर वह स्वयं ही जैक गैरज के अंदर रख देंगे. मैंने गैरज की चाबी इन्हें दे दी थी.”
“पर इनके पास कार तो है नहीं?” इंस्पेक्टर ने टोक कर कहा.
“इस बात का ध्यान मुझे कल आया. कल मैंने आपसे झूठ बोला था. यह दोनों मेरे घर में ही छिपे थे. इनकी बातों में आकर मैंने इन्हें अपने घर में छिपने दिया था.  पर आपके जाने के बाद मुझे इनकी चाल समझ आ गयी थी. इन्होंने पिछले सप्ताह ही मेरे गैरज की डुप्लीकेट चाबी बनवा ली थी. बैंक लूट कर रूपये वहीं छिपा दिए थे. यह जानते थे कि किसी को यह संदेह न होगा की रुपये मेरे कार गैरज में रखे हैं.”
“तुमने यह सब मुझे पहले क्यों नहीं बताया?” इंस्पेक्टर ने पूछा.
“इन दोनों ने कई बार मुझे मूर्ख बनाया है. इसलिये मैंने सोच था की दोनों को एक बार ऐसी पटखनी दूंगा की इन्हें जीवन भर याद रहे.” भीमा अपने समझ पर इतराने लगा.
इतने में सियार और भेड़िये का तीसरा साथी लोमड़ भी आ पहुंचा. पुलिस ने उसे भी पकड़ लिया.
अगले दिन भालू ने चतुरलाल बंदर से कहा, “तुम्हारी बात न मान कर मैंने बड़ी भूल कर दी थी. मैं तो उन बदमाशों के अपराध का भागीदार बनने वाला था.”
“भइया, अंत भले का भला.” बंदर ने कहा 
© आई बी अरोड़ा 

Tuesday, 9 September 2014

अच्छे दिन

लोमड़ जेल से छूट कर आया ही था कि सियार और लकड़बग्घा उसके अड्डे पर आ पहुंचे.
“कहो भाई, कैसी रही जेल यात्रा?” सियार ने पूछा.
“जेल में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?”लकड़बग्घे ने पूछा.
“मैं जेल गया था, श्रीनगर की सैर करने नहीं गया था,” लोमड़ ने गुस्से से कहा.
अरे भाई, नाराज़ क्यों होते हैं? हम जानते हैं कि जेल में आपको कितना कष्ट सहना पड़ा होगा,” सियार ने कहा.
“भाई, हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं. मैं ऐसी सूचना लाया हूँ कि आप सुन कर उछल पड़ेंगे,” लकड़बग्घे ने कहा.
लोमड कुछ नहीं बोला. बस दोनों को घूर कर देखता रहा. दोनों डर कर चुप हो गये.
“बोलो क्या कहना है?” लोमड ने चिढ़ कर कहा.
वह दुःखी था क्योंकि इस बार जेल में कालू भेड़िये ने उसकी खूब पिटाई की थी. कालू हर दिन उसे मारता पीटता रहा था. लोमड़ कई बार जेल जा चुका था. पर जितनी दुर्दशा उसकी इस बार हुई थी ऐसे दुर्दशा उसकी पहले कभी न हुई थी.
“हमें पता चला है कि रिज़र्व बैंक बहुत सारा सोना मुंबई भेज रहा है. यह सोना मुंबई एक्सप्रेस से ले जाया जायेगा. हमने सब पता लगा लिया है कि सोना कब और कैसे भेजा जाएगा,” सियार ने कहा.
लोमड़ की आंखें चमकने लगीं. वह सोचने लगा कि अगर बैंक का सोना वह सब  मिलकर चुरा लें तो सच में अच्छे दिन आ जायेंगे. करोड़ों रूपए का सोना मिल जाये तो वह सीधा अमरीका चला जाएगा और वहां पर एक अच्छा अमरिकन बन कर रहेगा.
“क्या भइया, अमरीका के सपने देख रहे हो?” लकड़बग्घे ने पूछा.
“तुम्हें कैसे पता चला?” लोमड़ ने झेंप कर पूछा.
“क्योंकि मैं भी अमरीका के सपने देख रहा हूँ? बस यह सोना हमारे हाथ लग जाये,” लकड़बग्घा बोला.
“सपने देखना बंद करो और जल्दी से मुंबई एक्सप्रेस के तीन टिकटें ले लो,” लोमड़ ने कड़क आवाज़ में कहा.
“भाई, कुछ सोचा आपने? यह काम कैसे करेंगे?” सियार ने धीमे से पूछा.
“मेरे दिमाग में एक योजना आ रही है. यह ट्रेन रात के लगभग तीन बजे एक घने जंगल से होकर जाती है. उसी जंगल में हम चेन खींच कर ट्रेन को रोक लेंगे. जंगल में चारों ओर घना अन्धेरा होगा. हम तुरंत उस डिब्बे पर दावा बोल देंगे जिसमें सोना रखा होगा. डायनामाइट की मदद से पहले रेल के डिब्बे का दरवाज़ा और फिर तिजोरी का दरवाज़ा उड़ा डालेंगे. किसी के आने से पहले ही हम सोना लेकर चंपत हो जायेंगे.”
“वाह भाई वाह, क्या योजना बनाई है,” सियार ने चापलूसी करते हुए कहा.
“भाई, एक बात समझ नहीं आई. हर बार हम योजना तो अच्छी बनाते हैं पर हर बार ही हम पकड़े जाते हैं और हमें जेल हो जाती है. ऐसा क्यों?,” लकड़बग्घे ने पूछा.
“चुप हो जा. हर समय अंट शंट बोलता रहता है. इस बार लोमड़ भाई ने खूब सोच समझ कर योजना बनाई है. इस बार हम अवश्य सफल होंगे,” सियार बोला.
तीनों निश्चित दिन रेलवे स्टेशन पहुंच गये. लोमड़ ने सियार से कहा, “ ज़रा देख कर आओ सोना किस डिब्बे में रखा है.”
सियार झटपट चल दिया और जल्दी ही लौट आया.
“सोना अंतिम डिब्बे में है. कई पुलिस वाले उस डिब्बे को घेर कर खड़े हैं.”
“यह तो अच्छा ही है. रात के अँधेरे में उस डिब्बे को खोजना कठिन न होगा,” लोमड़ ने कहा.
ट्रेन समय पर चल पड़ी. लोमड़ ने अपने साथियों से कहा, “ रात तीन बजे उठ जाना. अपनी-अपनी घड़ी में अलार्म लगा कर सोना. मैं किसी को उठाऊंगा नहीं.”       
लोमड जानता नहीं था कि उसका सबसे बड़ा शत्रु उसी ट्रेन में यात्रा कर रहा था.
कालू भेड़िया जेल से छूट कर बाहर आ चुका था. वह भी उसी ट्रेन से मुंबई जा रहा था. उसने लोमड़ को देख लिया था.
“यह लोमड़ अपने इन साथियों के साथ कहाँ जा रहा है? कुछ तो गड़बड़ है?” भेड़िये ने अपने आप से कहा.
रात तीन बजे ट्रेन अचानक रुक गई. सभी यात्री गहरी नींद में थे. कोई जान ही न पाया कि ट्रेन रुकी हुई है. पर कालू भेड़िये को तो रात में नींद आती न थी. वह ट्रेन से बाहर आया.
“यहाँ जंगल में ट्रेन क्यों रुक गई?” वह मन ही मन सोचने लगा.
तभी उसने देख की लोमड़ और उसके साथी ट्रेन की अंतिम डिब्बे की ओर झटपट भागते जा रहे थे.
“कुछ तो गड़बड़ है,” भेड़िये ने अपने आप से कहा.
लोमड़ ने अंतिम डिब्बे के दरवाज़े को डायनामाइट से उड़ा दिया. डिब्बे के भीतर जाकर उसने तिजोरी के दरवाज़े को भी उसी भांति उड़ा दिया. तिजोरी सोने की इंटों से भरी हुई थी. तीनों मिलकर सोने की ईंटों को बड़े-बड़े थैलों में रखने लगे. तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया. लोमड़ ने अपने साथियों से कहा, “चलो निकल चलें, पुलिस इधर ही आ रही है.”
तीनों कंधों पर थैले उठाये रेल के डिब्बे से बाहर आये. तीनों जंगल की ओर चल दिए. परन्तु अभी वह थोड़ी दूर ही गये थे कि कालू भेड़िया उनके सामने आ खड़ा हुआ. कालू को देख कर लोमड़ की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई.
लोमड़ कालू से डरता था. उसे यह भी डर था कि कहीं कालू उसके साथियों को यह न बता दे कि जेल में वह लोमड़ की खूब पिटाई किया करता था. सियार और लकड़बग्घे को अगर यह बात पता चल गई तो वह लोमड़ का कभी सम्मान न करेंगे.
“बड़ा हाथ मारा है इस बार. क्या बात है, ग्रेट ट्रेन राबरि. अब तो तुम पर फ़िल्में बनेगीं. किताबें लिखी जायेंगी,” भेड़िये ने हंसते हुए कहा.
“कालू यह ठीक नहीं कर रहे तुम,” लोमड़ ने कहा.
“मैं क्या कर रहा हूँ? मैं तो तुम्हारा बोझ हल्का करना चाहता हूँ. इतना बोझ लेकर तुम लोग कहाँ तक भागोगे?” कालू ने कहा.
“हम यह सोना नहीं देंगे,” लोमड़ ने अकड़ कर कहा.
“तीनों थैले यहाँ रख कर चलते बनो. मुझे गुस्सा आ गया तो वह तुम्हारे लिए ठीक न होगा,” भेड़िये ने गुर्रा कर कहा.
“कालू यह सोना अगर मुझे न मिला तो मैं तुम्हें भी न लेने दूंगा. मैं पुलिस को सब बता दूंगा.” लोमड़ ने उसे धमकाने का प्रयास किया.
“अच्छा, तुम पुलिस के पास जाओगे? पुलिस तुम्हारा विश्वास कर लेगी?” भेड़िये ने हंस कर कहा.
“नहीं-नहीं, यह लोमड़ पुलिस के पास क्यों जायेगा. पुलिस ही इसके पास आयेगी.”
कालू, लोमड़, सियार और लकड़बग्घा समझ न पाये कि यह बात किसने कही थी. उन चारों के अतिरिक्त वहां कोई न था. चारों एक दूसरे का मुंह देखने लगे.
बेचारे जानते न थे कि यह बात इंस्पेक्टर होशियार सिंह ने कही थी. हाथ में पिस्तौल लिए अचानक वह उनके सामने आ गया. इंस्पेक्टर को देख कर चारों के होश उड़ गये.
“आप यहाँ कैसे?” लकड़बग्घा अपने को रोक न पाया और पूछ बैठा.
“मैं तो इस कालू का पीछा कर रहा था. मुझे संदेह था की जल्दी ही यह कोई कांड करेगा. पर मुझे क्या पता था की तुम रिज़र्व बैंक का सोना लुटने वाले हो और मैं इतनी बड़ी डकैती को रोकने वाला हूँ. क्यों भई लोमड़, जेल से छूटते समय तो तुमने कहा था कि तुम सुधर गये हो. अब कोई गलत काम न करोगे. तो यह सब क्या है?”
“इंस्पेक्टर साहब, मैंने कुछ नहीं किया. यह काम  तो इन तीनों का है,” लोमड़ ने झूठ बोल कर अपने आप को बचाने का प्रयास किया. पर इंस्पेक्टर उसकी बातों में कहां आने वाला था.  उसने चारों को हथकड़ी लगा दी.
“मैंने कहा था, हमारी हर अच्छी योजना हमें जेल ही ले जाती है,” लकड़बग्घा बोला. वो पुलिस की मार से बहुत डरता था इसलिये उसकी आँखों से आंसू निकल आये.
रोते-रोते उसने लोमड़ से पूछा, “भइया, हमारे अच्छे दिन कब आयेंगे?” 

© आई बी अरोड़ा