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Wednesday, 10 June 2015

वाशिंग मशीन की छींक



मनु अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था. पर पढ़ने में उसका मन न लग रहा था. आँखें पुस्तक पर थीं पर मन कहीं ओर था.

उसकी मां वाशिंग मशीन में कपड़े धो रही थी. अचानक वाशिंग मशीन ने ज़ोर से छींक मारी. मनु को गुस्सा आ गया. उसने माँ से कहा, “जब मैं पढ़ने बैठता हूँ यह मशीन छींकने लगती है. मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता.”

“जब तुम्हारी पुस्तकें मुझ पर हंसने लगती हैं तब क्या होता है? क्या वह तुम्हें अच्छा लगता है?” माँ ने कहा.

“मेरी पुस्तकों का क्या दोष है? मैंने कितनी बार कहा है कि मेरी पुस्तकों को नीला रंग अच्छा नहीं लगता, फिर भी आप नीले रंग के कपडे पहन कर मेरे कमरे आ जाती हैं, बस मेरी किताबें अपने को रोक नहीं पाती और हंसने लगती हैं.”

“अरे क्या बात है? अगर में हरे रंग के कपडे पहनूं तो तुम्हारे खिलौने नाराज़ हो जाते है......”

माँ की बात पूरी न हो पाई. दूसरे कमरे से मनु के पापा ने कहा, “तुम लोगों का झगड़ा कब तक चलेगा? यहाँ टीवी नाराज़ रहा है, तीन बार बिगड़ चुका है. मैं इसे क्या कहूँ?”

“उसे कहो थोड़ी देर पार्क में खेल आये.” माँ ने कहा.

“नहीं माँ, टीवी को पार्क में मत भेजो. पार्क में जाकर वह बहुत ऊधम मचाता है. पिछली बार उसने एक कार का शीशा तोड़ दिया था.” मनु बोला.

“अच्छा तो यही होगा कि तुम दोनों ही पार्क में जाकर अपना झगड़ा निपटा लो.” मनु के पापा ने थोड़ा गुस्से से कहा.

मनु ने झट से अपनी पुस्तकें उठाईं और जाने को तैयार हो गया. माँ ने एक थैले में कपडे और वाशिंग मशीन रख ली. दोनों पार्क में आ गये.

पार्क में मनु एक पेड़ के नीचे बैठ कर पढ़ने लगा. माँ ने पूछा, “मशीन कैसे चलेगी? बिजली का पॉइंट कहाँ है?”

“इस पेड़ पर एक कछुए का घर है. वहां बिजली का कोई पॉइंट होगा,” मनु ने कहा.

“तुम्हें कैसे पता कि इस पेड़ पर कछुए का घर है?”

“उसने मुझे बताया था, एक दिन, स्कूल में.”

“कछुआ तुम्हारे स्कूल में पढ़ता है?”

“वह तो रात में स्कूल जाता है, सोने के लिए. कह रहा था कि घर में उसे नींद नहीं आती. सारी रात उसके घर के ऊपर हवाई जहाज़ उड़ते रहते हैं. शोर के कारण वह घर में सो नहीं पाता. रात भर मज़े से किसी क्लास-रूम में बेंच पर लेट कर सो जाता है.”

“उससे पूछो कि क्या मैं उसके घर से बिजली ले सकती हूँ?”

“उसका घर तो बहुत ऊपर है, मैं ऊपर कैसे जाऊं?” मनु ने पेड़ की ओर देखते हुए कहा.

“अपनी साइकिल पर जाओ.”

मनु झटपट घर से अपनी साइकिल ले आया और पेड़ के ऊपर चढ़ गया. वह तुरंत लौट भी आया.

“कछुआ कह रहा है कि मुझ से क्यों पूछते हो, मैं यहाँ रहता हूँ पर यह घर मेरा नहीं है,” मनु ने कहा.

तभी कछुए ने ऊपर से ही चिल्ला कर कहा, “मैं तो मज़ाक कर रहा था. अपनी वाशिंग मशीन यहाँ लगा लो.”

मनु मशीन की तार लेकर पेड़ के ऊपर गया और कछुए के घर में एक बिजली के पॉइंट पर उसे लगा दिया. मशीन चलने लगी और मनु की माँ कपडे धोने लगी.

मनु कछुए से बातें करने लगा. तभी वाशिंग मशीन ने छींक मारी. कछुआ डर से उछल पड़ा और पेड़ से नीचे आ गिरा.

“यहाँ कुत्ता कौन ले कर आया है? इस पार्क में कुत्ते लाने की अनुमति नहीं है.” कछुए ने थोड़ा गुस्से से कहा.

“यहाँ तो कोई कुत्ता नहीं है,” मनु की माँ ने कहा.

“आपने कुत्ते को कहीं छिपा दिया है. मैंने अभी-अभी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनी थी. अभी पिछले वर्ष ही ऐसा हुआ था. एक जोकर एक कुत्ता ले कर आ गया था. कुत्ता भौंकने लगा और ठीक मेरे घर के ऊपर एक वायुयान के सारे शीशे टूट गये थे,” कछुआ घबराहट में बहुत तेज़-तेज़ बोल रहा था.

“फिर क्या हुआ?” मनु ने पूछा. उसे कछुए की बातों में मज़ा आ रहा था.

“होना क्या था? दो दिन तक वह वायुयान मेरे घर के ऊपर ही खड़ा रहा और दो दिनों तक मुझे सभी यात्रियों की सेवा करनी पड़ी. इस महान कार्य के लिए मुझे सरकार की ओर से कोई मैडल या पुरूस्कार भी नहीं मिला. उसी दिन मैंने पार्क में कुत्तों को लाने पर रोक लगवा दी थी. जब तक सरकार मेरा सम्मान नहीं करती तब तक यह रोक लगी रहेगी.”

“अरे, यह तो मेरी वाशिंग मशीन है, यह कभी-कभी छींक मार देती है,” मनु की माँ ने कहा.

“क्या आप अपनी वाशिंग मशीन को सही समय पर चाय या कॉफ़ी नहीं पिलातीं?” कछुए ने पूछा.

क्या तुम मुझे बुद्धू समझते हो?” माँ ने कछुए से कहा.

“आप मेरी बात नहीं समझ रहीं, अगर आप मशीन को सही समय पर चाय, कॉफ़ी पिलाएँगी तो मशीन कभी भी छींक न मारेगी.”

मनु को उन दोनों की बातों में बिलकुल मज़ा न आ रहा था, वह सोच रहा था कि अगर कोई हवाई जहाज़ अभी इस पेड़ के ऊपर आकर रुक जाये तो कितना अच्छा होगा. अपनी साइकिल पर बैठ वह सीधा पेड़ पर चढ़  जायेगा और उस हवाई जहाज़ के अंदर चला जाएगा.

वह अपनी सोच में इतना मग्न हो गया था की उसे पता ही न चला की माँ उससे कुछ कह रहीं थीं.

“तुम पढ़ रहे हो या दिन में सपने देख रहे हो,” मां ने थोड़ा झकझोर कर कहा.

मनु नींद से जागा. वह अपने स्टडी टेबल पर ही बैठा था. माँ को देख वह मंद-मंद मुस्कुरा दिया.


© आइ बी अरोड़ा 

Tuesday, 24 March 2015



एक सूफ़ी कहानी

रात का समय था. एक चोर एक घर में घुसने की कोशिश करने लगा. चोर खिड़की के रास्ते घर के भीतर घुस रहा था. अचानक खिड़की टूट कर चोर के हाथ पर आ गिरी. चोर का हाथ टूट गया.

चोर ने क़ाज़ी¹ के सामने शिकायत कर दी. उसका आरोप था कि उस घर का मालिक दोषी था, उसके कारण ही चोर का हाथ टूट गया था.

घर का मालिक क़ाज़ी के सामने उपस्थित हुआ. उसने क़ाज़ी से कहा, “हुजूर,  दोष मेरा नहीं उस बढ़ई² का है जिसने यह खिड़की बनाई थी. बढ़ई ने खिड़की बनाने में अवश्य कोई गलती की होगी जो खिड़की टूट कर गिर गई और इस आदमी का हाथ टूट गया.”

क़ाज़ी के आदेश पर बढ़ई आया. उसने क़ाज़ी से कहा, “हुजूर, मैंने तो खिड़की बनाने में कोई गलती नहीं की. गलती मिस्त्री³ की है. उसने खिड़की सही ढंग से नहीं लगाई थी. उसे ही सज़ा मिलनी चाहिए.”

अब मिस्त्री को बुलाया गया. मिस्त्री ने कहा, “हुजूर, मैं तो बहुत अच्छा कारीगर हूँ और अपने काम में कभी कोई गलती नहीं करता. पर जब में खिड़की लगा रहा था तब एक औरत वहां से गुज़र रही थी. मैं उस औरत को देखने लगा और खिड़की सही ढंग से न लगी. गलती मेरी नहीं उस औरत की है. अगर वह उस समय वहां से न गुज़रती तो मुझसे कोई गलती न होती.”

औरत को भी क़ाज़ी के सामने उपस्थित होना पड़ा. उसने क़ाज़ी से कहा, “ मैं तो एक साधारण औरत हूँ. कोई मुझे नहीं देखता. लोग तो मेरे सुंदर सतरंगी दुपट्टे को देखते हैं. दोष मेरा नहीं उस रंगरेज़° का है जिसने मेरा दुपट्टा रंगा था.”  

क़ाज़ी ने रंगरेज़ को बुलवाया. पर रंगरेज़ तो वही आदमी निकला जो उस घर में चोरी करने गया था और जिसका हाथ टूट गया था. वह उस औरत का पति था और उसी ने क़ाज़ी के सामने शिकायत की थी.
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इस सूफी कहानी का अभिप्राय है की अपने सब कर्मो का फल हमें ही भोगना होगा. कोई अन्य हमारे कर्मों का भागीदार नहीं हो सकता.


¹ क़ाज़ी – Judge
² बढ़ई -  Carpenter
³ मिस्त्री -Mason
º रंगरेज़ –Dyer 

Monday, 23 March 2015


दीक्षा

भगवान बुद्ध, प्रसन्नता से बैठे, अपने शिष्यों के साथ चर्चा कर रहे थे. तभी एक व्यक्ति ने आकर भगवान बुद्ध पर थूक दिया.

बुद्ध ने एक कपड़े से थूक को पोंछ कर, मुस्कुराते हुए, उस व्यक्ति से पूछा, “भाई, क्या तुम्हें कुछ और कहना है?”

वह व्यक्ति सकपका गया. उसने तो सोच रखा था कि बुद्ध और उनके शिष्य उसे बुरा-भला कहेंगे, उससे झगड़ा करने लगेंगे. पर बुद्ध तो इतने प्यार और आदर से उससे बात कर रहे थे कि जैसे उसने उनका सम्मान किया हो.

उस व्यक्ति को समझ ही न आया कि वह क्या कहे. वह कुछ बोल न पाया और घबरा कर वहां से चल दिया.

उसके जाते ही बुद्ध का एक शिष्य, आनंद, बोला, “भगवन, हम तो आपका सम्मान कर चुप रहे, अन्यथा ऐसे दुष्ट व्यक्ति को तो हम दण्डित करते.”

बुद्ध ने मुस्कुरा कर कहा, “आनंद, मुझे उस व्यक्ति के व्यवहार पर नहीं, तुम्हारे व्यवहार पर आश्चर्य हो रहा है. मेरी शिक्षा का तुम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा लगता. उस व्यक्ति के मन में कोई बात रही होगी, किसी बात पर उसे गुस्सा होगा, शायद मुझ पर चिल्लाने से या मुझे गाली देने से उसके मन की फांस न निकलती होगी, इसी कारण उसने मुझ पर थूक दिया. मुझ पर थूक कर उसने अपने मन की फांस निकाल ली. पर तुम्हें क्या हुआ? तुम्हें तो अपने मन को अपने वश में रखना चाहिये. ऐसा व्यवहार मेरे शिष्य को शोभा नहीं देता”

भगवान बुद्ध की बात सुन आनंद को बहुत ग्लानि हुई. उसे अपनी भूल का अहसास हुआ.

उधर जिस व्यक्ति ने बुद्ध पर थूका था वह बुद्ध के विनम्र व्यवहार से विचलित हो गया था. उसे लग रहा था की उसने बहुत बड़ी भूल कर दी थी. उसे अपने अभद्र व्यवहार पर पछतावा होने लगा. वह रात भर सो न पाया और दिन होते ही बुद्ध के आश्रम की ओर दौड़ा.

आश्रम में वह भगवान बुद्ध के चरणों में झुक गया और अपनी भूल की क्षमा मांगने लगा.

बुद्ध ने कहा, “जिसे तुम ने अपमानित किया था वह मैं नहीं हूँ, वह पुरुष तो कब जा चुका. हम सब हर पल, हर घड़ी बदल रहे हैं, नवीन हो रहे हैं, जैसे गंगा हर पल, हर घड़ी बदलती रहती है. जिस गंगा में तुम एक बार उतरते हो उस गंगा में तुम दुबारा कभी नहीं उतर सकते. मैं वह पुरुष नहीं है जिस पर कल तुम ने थूक दिया था. तुम भी वह व्यक्ति नहीं हो जिसने बुद्ध पर थूका था. इसलिये तुम्हें मुझ से क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता नहीं. जाओ और अपने मन कोई भी फांस न रखो.”

भगवान बुद्ध की बातों ने उस व्यक्ति को इतना प्रभावित किया कि उसने भगवन से दीक्षा ले ली.


Monday, 19 January 2015

दादा जी का कुत्ता


दादा जी एक कुत्ता लाये. दादी जी ने उसका नाम रखा लेज़ी. कुत्ता बिलकुल भी सुस्त नहीं था, बहुत ही तेज़-तरार था. पर फिर भी दादी जी ने नाम रख दिया, लेज़ी; अर्थात सुस्त. कुत्ता यह बात जानता न था. वह अपने नाम से बहुत प्रसन्न था. जल्दी ही सब से उसकी मित्रता हो गई और वह घर का एक सदस्य बन गया.

एक वर्ष बीत गया. एक दिन दादा जी एक मुर्गा और दो मुर्गियाँ ले आये.

दादा जी का एक मित्र था. मित्र ने एक मुर्गा और दो मुर्गियाँ पाल रखी थीं. उसका बेटा दिल्ली में रहता था. बेटे के बुलाने पर मित्र दिल्ली चला गया. जाने से पहले मुर्गा और मुर्गियाँ दादा जी को दे गया. बोला, “ इनका क्या करूं? साथ ले नहीं जा सकता. किसी को दे दूँगा तो वो अवश्य इन को मार कर खा जायेगा. खा कर कहेगा कि बिल्ली खा गई. आप इनको रख लो. लौट कर मैं आप से ले लूंगा.”

                                    


दादा जी ले तो आये पर दादी जी बहुत गुस्सा हुईं. उनसे भी अधिक गुस्सा लेज़ी को आया. मुर्गे उसे अच्छे न लगते थे. नाक भौंह चढ़ा कर उसने मुर्गे की ओर देखा. अकड़ कर बोला, “मेरा नाम लेज़ी है, कभी भूलना नहीं.”

मुर्गा हंस दिया. फिर मुर्गे ने उससे कहा, “अरे, क्या तुम सच में लेज़ी हो?”

लेज़ी का गुस्सा अब सातवें आसमान पर पहुँच गया.

“क्या कहा तुम ने?” उसने चिढ़ कर पूछा.

“जानते भी हो कि लेज़ी का अर्थ क्या होता है? यह इंग्लिश भाषा का शब्द है, इतना तो पता ही होगा? या इंग्लिश समझ ही नहीं आती?” मुर्गा भी चिढ़ कर बोला.

अब कुत्ता अपने धैर्य खो बैठा और मुर्गे पर झपटा. कुत्ता यह समझे बैठा था कि उसके डीलडौल को देख कर मुर्गा डर कर पीछे हट जायेगा. कहीं जा कर छिप जायेगा. पर मुर्गा डरने वाला न था. वह भी कुत्ते पर झपटा.

मुर्गे ने अपने पंख फैला रखे थे. पूरी ताकत से उसने कुत्ते के चेहरे पर अपनी चोंच से वार किया. कुत्ता सहम गया. पीछे हटने में उसे अपनी भलाई लगी. पर मन ही मन वह तिलमिला कर रह गया. एक मुर्गे ने उसे डरा दिया था, उसे पीछे हटना पड़ा था यह बात उसे हज़म नहीं हो रही थी.

मुर्ग़े ने अकड़ कर कहा, “लेज़ी का अर्थ होता है सुस्त. ध्यान रखना मुझे सुस्त लोग अच्छे नहीं लगते. मेरी मुर्गियाँ तो सुस्त लोगों को देखना भी पसंद नहीं करतीं.”

कुत्ता कसमसा कर रह गया. इतना अपमान आज तक किसी ने उसका नहीं किया था. 
मुर्गे से अपने अपमान का बदला लेने की बात उसने मन में ठान ली.

मुर्गे को अपनी कलगी पर बहुत अभिमान था. अकड़ कर ऐसे चलता था कि जैसे उसके सिर पर कलगी नहीं कोई राज मुकुट हो.

लेज़ी ने मन ही मन सोचा, “एक दिन मैं इसकी कलगी ही काट कर खा जाऊंगा.”

पर मुर्गे पर झपटने का साहस वह न कर पाया. मुर्गा हमेशा सजग रहता था. कुत्ता अगर उसकी ओर देखता भी तो मुर्गा उस पर हमला करने को तैयार हो जाता. उसका रूप देख कर कुत्ता सहम जाता.

एक दिन कुत्ते ने देखा कि मुर्गा सो रहा है. कुत्ते ने आव देखा न ताव  और मुर्गियों पर टूट पड़ा. मुर्गियाँ घबरा कर चिल्लाने लगीं. मुर्गा तुरंत नींद से उठ बैठा. अपनी घबराई हुई मुर्गियों को देख कर वह आग बबूला हो गया. उसने कुत्ते पर हमला कर दिया. उसकी पीठ पर कूद कर चढ़ बैठा और चोंच से उसे यहाँ-वहां मारने लगा.

शोर सुन कर दादा जी कमरे से बाहर आये. कुत्ते और मुर्गे को इस तरह लड़ते देख कर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ. उन्हें विश्वास न हुआ कि इतना बड़ा और  ताकतवर कुत्ता मुर्गे से मार खा रहा था.

वह लाठी ले कर दौड़े. उन्हें इस तरह आता देख मुर्गा भाग खड़ा हुआ. कुत्ते भी जान बचा कर दादा जी के कमरे में घुस गया.

“अरे, तुम उस मुर्गे से मार खा रहे थे? कैसे कुत्ते हो तुम?” दादा जी ने उसे झिड़कते हुए कहा.

लेज़ी क्या कहता, मन ही मन दुःखी हो रहा था.  

“तुम उससे लड़ क्यों रहे थे? एक बात याद रखना, लड़ाई में तुम जीत भी सकते हो और हार भी सकते हो. लेकिन लड़ाई में जीत कर भी हार ही होती है. हारने वाला सदा जीतने वाले से घृणा ही करता है. प्यार से ही तुम हर किसी को भी अपने वश में कर सकते हो. इस मुगे को भी. कुछ समझ आया कि नहीं?”

बात लेज़ी की समझ में आ गई थी. वह यह भी जानता था कि  मुर्गे से उसने ही अभद्र व्यवहार किया था. उसने मुर्गे को कमज़ोर समझ कर अपना रोब जमाने की कोशिश की थी.

उसने मुर्गे से मित्रता करने की ठान ली. पर मुर्गा भी घमंठी था. इस कारण दादा जी ने एक बार उसे भी खूब डांटा. बस फिर क्या था दोनों ने झट से मित्रता कर ली.

अब न लेज़ी मुर्गे से डरता था, न मुर्गियाँ कुत्ते से डरती थीं, न मुर्गा कुत्ते से दूर रहता था. सब मिलजुल कर मित्रों की भांति रहते थे.
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© आई बी अरोड़ा


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Tuesday, 6 January 2015

सज़ा
(भाग 1 )
श्रीमान सियार एक चोर था. हर चोरी वह बहुत ही सोच समझ कर करता था. चोरी की पूरी योजना बनाता था. जिस जगह चोरी करनी होती थी उस जगह की पूरी जानकारी प्राप्त कर लेता था. घर के अंदर-बाहर जाने वाले रास्तों को ठीक से समझ लेता था. चोरी के समय घर के भीतर कितने लोग होंगे इसका भी पता लगा लेता था. सुरक्षा का क्या प्रबंध हैं इसकी भी जानकारी ले लेता था.
सबसे अधिक होशियारी वह चोरी करते समय दिखाता था. जहां चोरी करता वहां अपना एक भी सुराग न छोड़ता था. इस कारण पुलिस को कभी पता ही न चलता था की चोरी किसने की है. लाख कोशिश के बाद भी पुलिस उसे पकड़ न पाई थी. इंस्पेक्टर होशियार सिंह को श्रीमान सियार पर संदेह तो था. पर वह उसे कभी पकड़ न पाया.
एक दिन भेष बदल कर श्रीमान सियार बैंक आया. उसे न तो पैसे निकालने थे न जमा करने थे. वह तो बस यह देखने आया था की क्या कोई बैंक से भारी रकम निकाल रहा है.
एक बैंक अधिकारी के साथ वह बातें करने लगा, “अगर मैं पाँच वर्षों के लिए पैसे जमा कराऊँ तो मुझे कितना ब्याज मिलेगा?”
बैंक अधिकारी उसे अलग-अलग बचत योजनों के बारे में बताने लगा. परन्तु श्रीमान सियार का ध्यान तो श्रीमान हिरण की ओर था जो उस समय बैंक से दस लाख रूपये निकाल रहा था.  श्रीमान हिरण की बेटी का विवाह कुछ दिनों बाद होने वाला था. विवाह के लिए जो भी प्रबंध करना था उसके लिए उसे पैसे चाहिए थे. इसी कारण वह दस लाख एक साथ निकाल रहा था.
“इतने पैसे घर में रखने की क्या आवश्यकता है? आप थोड़े-थोड़े पैसे भी निकाल सकते हैं.” एक बैंक अधिकारी ने श्रीमान हिरण को समझाया.
“अरे कौन बार-बार पैसे निकालने आये? वैसे भी सारे पैसे कुछ ही दिनों में खर्च हो जायेंगे.” श्रीमान हिरण ने कहा.
श्रीमान हिरण की बातें सुन श्रीमान सियार के दिमाग में घंटियाँ बज रही थीं. उसके मन में लड्डू फूट रहे थे. दो माह पहले ही उसने हिरण के घर की पूरी टोह ली थी. उसने सुन रखा था की हिरण की बेटी का विवाह होने वाला है. उसे बस यह पता न था की विवाह कब होगा.
“मैं सोच कर आपको बताऊंगा हूँ कि मुझे कितने रूपये जमा कराने हैं.” श्रीमान सियार ने उस बैंक अधिकारी से कहा जो उसे बचत योजनाओं के बारे में अभी बता रहा था और झटपट वहां से चल दिया. उसे तुरंत यह जानकारी प्राप्त करनी थी की हिरण के घर में कितने लोग हैं. उसने तय कर लिया था कि आज रात ही वह हिरण के घर चोरी करेगा.
भिखारी के भेष में वह हिरण के घर पर निखरानी करने लगा. थोड़ी ही देर में वह जान गया की घर पर सिर्फ तीन लोग ही थे, हिरण, उसकी पत्नी और बेटी जिसका विवाह होने वाला था. शाम के समय बेटी अपने मित्रों के साथ चली गयी. एक मित्र के घर पर पार्टी थी. वह रात में देर से ही लौटने वाली थी.
“इससे अच्छा अवसर कभी न मिलेगा. हिरण के घर में घुसना बिलकुल आसान है. घर पर सिर्फ दो लोग हैं. उन्हें पता भी न चलेगा और दस लाख रूपये मेरे पास होंगे. यह तो सुनहरा अवसर है.”
अपनी समझदारी पर वह स्वयं ही इतरा रहा था. आज तक इस नगर में किसी चोर ने इतनी बड़ी चोरी न की थी. उसे पूरा विश्वास हो गया की आज रात के बाद चोरों के इतिहास में उसका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जायेगा. नगर के सब चोर उससे ईर्षा करेंगे.

रात दस बजे श्रीमान सियार बहुत ही चालाकी और होशियारी के साथ श्रीमान हिरण के घर में घुस गया. उसने चेहरे पर काला कपड़ा लपेट रखा था. भीतर घुसते ही उसे हंसने की आवाज़ सुनाई दी.
(क्रमश) 
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© आई बी अरोड़ा

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