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Wednesday, 8 October 2014

मोतियों की माला
बिरजू और सोमू मित्र थे. दोनों एक सेठ के यहाँ नौकरी करते थे. बिरजू मेहनती था. लग्न के साथ अपना काम करता था. फिजूलखर्ची बिल्कुल न करता था. अपनी कमाई से वह बहुत पैसे बचा लेता था. हर माह गाँव आकर अपनी पत्नी को पैसे दिया करता था. अपनी बेटी, लक्ष्मी, के लिए कोई न कोई उपहार भी लाया करता था. उसका परिवार बहुत सुखी था.
सोमू भी मेहनती था. पर वह बुरी संगत में पड़ गया था. मौज-मस्ती करना उसे अच्छा लगता था. अपनी कमाई का बड़ा भाग वह अपनी मौज-मस्ती पर गंवा बैठता था. पत्नी और बेटे से मिलने कभी-कभार ही जाया करता था. इस कारण उसकी पत्नी और बेटा उदास और दुःखी रहते थे.
एक दिन सोमू के पड़ोसी ने गाँव से आकर बताया कि उसका बेटा बीमार है. उसकी पत्नी ने तुरंत घर बुलाया है. परन्तु सोमू घर जाने को तैयार न हुआ. बिरजू को इस बात का पता चला तो उसने सोमू को समझाया, “मैं कल गाँव जा रहा हूँ. तुम्हें भी मेरे साथ चलना होगा. वैसे भी तुम तीन-चार माह से घर नहीं गये. अब तो बेटा भी बीमार है.”
सोमू आना-कानी करने लगा पर बिरजू ने उसकी एक न सुनी और अपने साथ उसे गाँव ले गया.
इधर उधर की बातें करते दोनों गाँव की ओर चल दिए. बातों ही बातों में सोमू जान गया कि बिरजू अपने साथ पांच हज़ार रूपए ले जा रहा था. सोमू के पास सिर्फ एक सौ रूपए थे. परन्तु उसने कहा, “मैं भी पांच रूपए ले जा रहा हूँ. इस बार मैंने कोई फिजूलखर्ची नहीं की.”
बिरजू को उसकी बात का विश्वास न हुआ, पर वह चुप रहा. वह जानता था कि सोमू सच नहीं बोल रहा था.
रास्ते में एक जगह एक कूआँ था. वहां पहुँचने पर सोमू ने कहा, “ज़रा रुको, मैं थोड़ा पानी पी लूँ. बहुत प्यास लगी है.”
सोमू कूँये से पानी निकालने लगा. तभी उसने जानबूझ कर अपनी पोटली कूँये में गिरा दी. फिर वह रोने चिल्लाने लगा, “अरे मेरी पोटली कूँये में गिर गई. मेरे पैसे उसी पोटली में थे. अब मैं अपनी पत्नी को क्या दूंगा? अब मैं अपने बेटे का इलाज कैसे कराऊंगा?”
सोमू की सूरत देख बिरजू घबरा गया. उसने कहा, “चुप हो जाओ और धीरज रखो. मैं तुम्हारी पोटली निकाल कर लाऊँगा.”
इतना कह बिरजू कूँये में उतर गया. सोमू यही चाहता था. उसने झटपट बिरजू के कपड़ों और पोटली की तलाशी ली. पोटली की अंदर एक छोटी सी थैली थी जिसमें उसके रूपये थे. सोमू ने वह थैली निकल कर छिपा ली.
बिरजू कूँये से सोमू की पोटली निकाल लाया. सोमू खुशी से उछल पड़ा. उसने बिरजू को गले लगा लिया और बार-बार धन्यवाद दिया.
बिरजू घर पहुंचा तो उसकी बेटी भागती हुई आई और बोली, “इस बार मेरे लिए क्या लाये हो?”
“इस बार मोतियों की माला लाया हूँ. अपनी छोटी सी गुड़िया के लिये छोटी सी माला.” इतना कह बिरजू ने अपनी पोटली खोली. पर पोटली में न तो रुपये थे, न ही मोतियों की माला. वह बहुत हैरान हुआ. पर उसने अपनी पत्नी से कुछ न कहा.

उधर घर पहुँच कर सोमू ने चुराये हुए रुपये अपनी पत्नी, राधा, को दिए और कहा, “पूरे पांच हज़ार रुपये हैं. संभाल कर रखना. इस बार मैंने बहुत मेहनत की. इस कारण सेठ जी ने प्रसन्न हो कर इतने रुपये दिए.”

राधा ने जब रुपयों की थैली खोली तो उसमें उसे एक मोतियों की माला दिखाई दी. माला देख कर उसे आश्चर्य हुआ.
“यह माला किस के लिये लाये हो?” उसने सोमू से पूछा.
“कौन सी माला?”
“अरे, वही माला जो रुपयों की थैली में है?”
“मैं भूल ही गया था. वह मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ.”
“मेरे लिए? इतनी छोटी माला? इतनी छोटी माला तो कोई छोटी बच्ची ही पहन सकती है.”
सोमू मन ही मन पछताया की उसने थैली की ठीक से जांच क्यों न की. वह डर गया कि कहीं राधा को कुछ संदेह न हो जाये और उसकी चोरी पकड़ी जाये. परन्तु पांच हज़ार रूपए पाकर राधा इतनी प्रसन्न थी कि उसने किसी बात की ओर ध्यान ही न दिया. रुपये उसने संभाल कर रख दिये और बिरजू के घर की ओर चल दी. बिरजू की पत्नी उसकी पक्की सहेली थी.
बिरजू के घर में उसकी बेटी, लक्ष्मी, रो रही थी.
“क्या हुआ हमारी लाडली बेटी को?” लक्ष्मी को पुचकारते हुए राधा ने पूछा. वह भी लक्ष्मी से बहुत प्यार करती थी.
“बापू मेरे लिए मोतियों की माला नहीं लाये. मुझे मोतियों की माला चाहिये.”
“अरे, तेरे बापू माला नहीं लाये तो क्या हुआ, मैं तुम्हें मोतियों की माला दूंगी,” राधा ने कहा.
लक्ष्मी को साथ ले राधा अपने घर आई. दोनों घर आमने-सामने ही थे. जो माला उसे रुपयों की थैली में मिली थी वह माला उसने लक्ष्मी को पहना दी. लक्ष्मी की खुशी का ठिकाना न रहा.
“मैं यह माला बापू को दिखाऊं?” उसने राधा से पूछा.
“हां, अभी जाकर दिखाओ,” राधा ने हंसते हुए कहा.
लक्ष्मी भागकर अपने घर आई. उसने अपने पिता को माला दिखाई. माला देखते ही बिरजू समझ गया कि सोमू ने ही उसकी रुपयों से भरी थैली चुराई थी.
“यह माला तो बहुत ही सुंदर है. क्या तुमने माला के लिए सोमू चाचा को धन्यवाद कहा?” बिरजू ने प्यार से बेटी के सर पर हाथ फेरते हुए पूछा.
“वो तो मैं भूल ही गई.”
लक्ष्मी को साथ लेकर बिरजू सोमू के घर आया. पिता के संकेत पर उसने सोमू से कहा, “चाचा, इस माला के लिए धन्यवाद. यह आप मेरे लिए ही लाये थे न?”  
सोमू की बोलती बंद हो गई. वह समझ गया कि बिरजू ने उसकी चोरी पकड़ ली है. वह डर गया कि कहीं बिरजू उसकी पत्नी और बेटे के सामने उसकी पोल न खोल दी. बिरजू भी सोमू के डर को भांप गया. उसने मुस्कराते हुए बिरजू से कहा, “ अरे, तुम ने यह माला कब खरीदी? कल तो तुम इतनी हड़बड़ाहट में थे? देखो, लक्ष्मी इसे पहन कर कितनी खुश है. मेरी ओर से भी तुम्हें बहुत-बहुत धन्यवाद.”
इतना कह कर बिरजू लौट गया. सोमू अपने आप में बहुत लज्जित हुआ. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. बिरजू के रुपयों की थैली लेकर वह उसी समय बिरजू के घर आया. थैली लौटा कर उसने बिरजू से कहा, “मैं तुम्हारा आभारी हूँ. तुमने राधा के सामने कुछ न कहा. मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि अब मैं कोई गलत काम न करूंगा. मैं राधा को भी सब सच-सच बता दूंगा.”
“नहीं, ऐसा मत करना. राधा को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है,” बिरजू ने कहा.
“नहीं मित्र, अगर मैंने यह बात राधा से छिपा ली तो शायद मैं फिर से कोई भूल कर बैठूं.”
उसने राधा को सब सच-सच बता दिया. राधा ने कहा, “तुमने बिरजू की पोटली चुरा कर बहुत गलत किया. पर मैं प्रसन्न हूँ कि तुम्हें अपनी भूल का अहसास हुआ है और तुमने वचन दिया है की फिर ऐसा न करोगे. मेरी एक बात सदा याद रखना, बुरी संगत से तो अच्छा है की आदमी अकेला ही रहे.”  
पत्नी की यह बात सोमू कभी न भूला.
© आइ बी अरोड़ा 

Monday, 25 August 2014

हठ का परिणाम



एक वन में एक पेड़ था. वह पेड़ वन के अन्य पेड़ों से बहुत छोटा था. यह बात उस पेड़ को बहुत खटकती थी. हर समय वह मन ही मन सोचा करता था, “कितना अच्छा होता अगर मैं वन का सबसे ऊँचा पेड़ होता. वन के सब पेड़ मुझ से ईर्षा करते.”
उस पेड़ की एक पक्षी से गहरी मित्रता थी. पेड़ को लगता था कि उसका मित्र संसार का सबसे सुंदर पक्षी है. उसने एक दिन अपने मित्र से कहा, “मित्र, तुम संसार के सबसे सुंदर पक्षी हो. क्या सब तुम से ईर्षा करते हैं?”
“मैं नहीं जानता कि मैं सबसे सुंदर पक्षी हूँ और सब मुझ से ईर्षा करते हैं,” पक्षी ने भोलेपन से कहा.
“मेरा मन चाहता है कि मैं संसार का सबसे ऊँचा वृक्ष बन जाऊं. सब मुझ से ईर्षा करें. इस वन में सभी वृक्ष कितने ऊंचें हैं. क्या तुम जानते हो कि यह सभी वृक्ष इतने ऊंचे कैसे हो गये?” पेड़ ने पूछा.
“नहीं, मुझे तो ऐसी कोई जानकारी नहीं है.”
“अरे, कोई तो जानता होगा?”
“एक साधु बाबा कभी-कभी इस वन में आते हैं. वह जानते होंगे. इक दिन हाथी कह रहा था कि साधु बाबा को हर बात की समझ है,” पक्षी ने कहा.
“वह जब भी इस वन में आयें तो मुझे बताना. मैं स्वयं उनसे बात करूंगा,” पेड़ ने कहा.
अब पेड़ उत्सुकता से साधु की प्रतीक्षा करने लगा. एक दिन पक्षी ने आकर उस पेड़ से कहा,  “साधु बाबा इधर आ रहे हैं.”
पेड़ ने देखा कि एक बहुत ही बूढ़ा व्यक्ति उस ओर आ रहा था. उसकी सफ़ेद दाड़ी उसके घुटनों को छू रही थी. उसके पास आते ही पेड़ ने कहा, “बाबा, प्रणाम. बाबा, आपको मेरी सहायता करनी ही होगी.”
“कहो, मैं क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए?” साधु ने पूछा.
“बाबा, मैं चाहता हूँ कि मैं वन का सबसे ऊँचा पेड़ बन जाऊं. आप मुझे बतायें कि मैं ऊँचा कैसे हो सकता हूँ.”
“अरे, ऊँचा होकर क्या होगा?” साधु बाबा ने कहा.
“वन के सब वृक्ष ऊंचे हैं. कुछ वृक्ष तो आकाश को छू रहे हैं. सिर्फ मैं ही छोटा हूँ. मुझे अच्छा नहीं लगता. आप मुझ पर कृपा करें. मुझे ऐसा उपाये बतायें जिससे मैं भी खूब ऊँचा हो जाऊं,” पेड़ ने कहा.
“मुझे तो लगता है कि दूसरों की नकल करने से कभी किसी का हित नहीं होता,” साधु ने समझाया.
“नहीं बाबा, मुझे भी औरों की भांति ऊँचा होना है.” पेड़ मिन्नत करने लगा.
“ठीक है, मेरी बात ध्यान से सुनो. तुम अपनी जड़ों को धरती में जितना गहरा फैला दोगे उतने ही तुम आकाश में ऊंचे होते जाओगे.”
“बस इतनी से बात है,” पेड़ ने कहा.
“हां, पर एक बात का ध्यान रखना. इतना भी ऊँचा मत हो जाना कि बादलों को आने-जाने में रुकावट हो.” इतना कह साधु बाबा चल दिये.
पेड़ प्रसन्नता से झूमने, गाने लगा. उसने अपने मित्र से कहा, “देखना अब मैं सब पेड़ों से ऊँचा हो जाऊँगा. आकाश को छू लूंगा.”
“तुमने सुना नहीं बाबा ने क्या चेतावनी दी थी?” मित्र ने कहा.
“अरे छोड़ो, अब तो मेरे मन में जो आयेगा मैं वही करूंगा.”
पेड़ अपनी जड़ों को धरती में दूर तक फैलाने लगा. जैसे-जैसे उसकी जड़ें धरती में फैलती गईं वैसे-वैसे वह ऊपर उठता रहा. हर दिन वह थोड़ा और ऊंचा हो जाता. एक सुबह जब वह नींद से जागा तो उसने देखा कि वह वन का सबसे ऊँचा पेड़ बन गया था. पल भर को उसे विश्वास न हुआ. वह ज़ोर से हंसा और उसने चिल्ला कर कहा, “अरे, सब इधर देखो. अब इस वन में मैं ही सबसे ऊँचा पेड़ हूँ. तुम सब पेड़ मुझ से छोटे हो. हा हा हा.”
उसका मित्र आया तो पेड़ को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ.
“मित्र, अब तो तुम सबसे ऊंचे पेड़ हो. तुम्हारे मन की इच्छा पूरी हो गई.”
“अभी तुम ने देखा ही क्या है? कुछ दिनों के बाद देखना वन के यह सारे पेड़ ऐसे लगेंगे जैसे कि छोटी-मोटी झाड़ियाँ हों,” पेड़ ने अकड़ कर कहा.
“लगता है कि तुम साधु बाबा की चेतावनी भूल गये हो?” पक्षी ने कहा.
“अरे, मेरे ऊंचे होने से बादलों को क्या दिक्कत हो सकती है?” पेड़ ने थोड़ा झुंझला कर कहा.
“तुम्हें बाबा की बात मान लेनी चाहिये. इसलिये अपना हठ छोड़ दो,” पक्षी ने समझाया.
पेड़ तो जैसे गर्व से फूला न समा रहा था. उसने अपने मित्र की एक न सुनी. वह ऊँचा होता गया. धरती के भीतर अपनी जड़ों को उसने बहुत दूर तक फैला दिया. उसे देख कर वन के सभी पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आश्चर्यचकित हो गए. पेड़ बहुत ही ऊंचा हो गया था. ऐसा लग रहा था कि वह आकाश को छू रहा था. 

पर वह पेड़ अभी भी संतुष्ट न था. एक दिन उसके मन में आया कि अगर वह थोड़ा और ऊँचा हो जाये तो चाँद को भी छू लेगा.
तभी आकाश में घने बादल घिर आये. सब बादल दक्षिण से उत्तर की ओर जा रहे थे. अचानक सब बादल रुक गये. अपने रास्ते में एक विशाल पेड़ को देख कर सारे बादल भौंच्चके रह गये. ऐसा तो आज तक न हुआ था. किसी पेड़ ने उनका रास्ता रोकने का साहस न किया था. सब बादल गुस्से से गरजने लगे.
“ओ मूर्ख पेड़, हमारा रास्ता रोक कर क्यों खड़े हो?” एक बादल ने कहा. वह विशाल हाथी जैसा दिख रहा था.
“गलती तुम्हारी है जो इतना नीचे उड़ रहे हो. तम्हें तो बहुत ऊपर उड़ना चाहिये,” पेड़ ने अकड़ कर कहा.
“हमारे रास्ते से हटो और हमें आगे जाने दो,” बादल  ने गरज कर कहा.
“मैं संसार का सबसे ऊँचा पेड़ हूँ. मैं नहीं हट सकता. तुम सब थोड़ा ऊपर हो कर निकल जाओ,” पेड़ ने इतराते हुए कहा.
“हम सब बहुत भारी हैं. अभी हमें कई जगह वर्षा करनी है. हम ऊपर नहीं जा सकते,” कई बादल एक साथ बोले.
पेड़ ने उनकी बात की ओर ध्यान ही न दिया और अकड़ कर खड़ा रहा. बादल गुस्से में चीखने चिल्लाने लगे. सारा वन उनकी गर्जना सुन कर काँप उठा. लेकिन ऊंचे पेड़ पर तो जैसे कोई प्रभाव ही न पड़ा. वह अपनी मस्ती में झूमता रहा.



अचानक ज़ोर से बिजली चमकी. सबसे ऊँचा पेड़ जलने लगा. पेड़ के कुछ भाग टूट कर दूर जा गिरे. वन के अन्य पेड़ों ने जब यह दृश्य देखा तो सब थर-थर कांपने लगे.
ऊँचा पेड़ बहुत चिल्लाया, सबसे सहायता मांगने लगा, पर कोई भी उसकी सहायता न कर पाया. देखते ही देखते पेड़ पूरी तरह जल गया.
कुछ दिन बाद साधु बाबा उस वन में फिर आये. जले हुए पेड़ को देख कर उन्होंने मन ही मन कहा, “किसी को भी जीवन में इतना हठी न होना चाहिये. हठी प्राणियों का अंत ऐसा ही होता है.”
© आई बी अरोड़ा 

Wednesday, 6 August 2014

धूर्त की मित्रता
एक सियार बूढ़ा हो चला था. भोजन जुटाना उसके लिए कठिन हो गया था. कभी-कभी तो उसे भूखा ही रहना पड़ता था.
सियार का शरीर तो कमज़ोर हो रहा था, परन्तु अभी भी उसका दिमाग खूब तेज़ था. दूसरों को फांसने की नई-नई चालें हर समय वह सोचता रहता था. सब जानते थे कि सियार बहुत चालाक है, सब उससे सावधान रहते थे.
एक दिन सियार ने नदी किनारे खरगोशों का एक जोड़ा देखा. खरगोशों को  देख कर उसकी आँखें चमकने लगीं. उसने मन ही मन कहा, “इनको पहले कभी नहीं देखा. शायद किसी दूसरे वन से आकर यहाँ बस गयें हैं. इन्हें चकमा देना सरल होगा. अगर यह दोनों मेरे हाथ लग जाएँ तो मज़ा आ जाये.”
अगले दिन सियार एक पेड़ के नीचे आ कर बैठ गया. खरगोश उस पेड़ के निकट ही रहते थे. सियार को देख कर दोनों डर गये. परन्तु सियार ने उनकी ओर देखा भी नहीं. वह तो अपनी आँखें बंद कर के बैठ गया, जैसे किसी सोच में हो.
बैठे-बैठे सियार बड़बड़ाने लगा, “मैं भी कैसा मूर्ख हूँ, ढेर सारी गाजरें ले आया. गाजरें बहुत स्वादिष्ट हैं, पर मैं तो गाजरें खाता नहीं. लगता है शरीर के साथ मेरा दिमाग भी कमज़ोर होता जा रहा है.”
सियार इतनी ज़ोर से बड़बड़ा रहा था कि खरगोशों ने सब सुन लिया. उन्हें गाजरें बहुत अच्छी लगतीं थीं. उनके मुंह में पानी आ गया.
एक खरगोश ने दूसरे से कहा, “तुम ने सुना, सियार क्या बड़बड़ा रहा था?”
दूसरा खरगोश बोला, “कुछ गड़बड़ है. यह सियार गाजरें क्यों लाएगा? इस सियार से दूर ही रहना. इसकी बातों में न आना.”
“तुम्हें तो हर बात में गड़बड़ दिखाई देती है. मुझे तो यह बूढ़ा सियार सीधा-साधा प्राणी लगता है. हमें इससे मित्रता कर लेनी चाहिये.”
“इस धूर्त सियार से मित्रता करोगे तो पछताओगे.”
“हम अभी-अभी इस वन में आये हैं. सबसे जान पहचान भी नहीं हुई और तुम कह रही हो कि यह सियार धूर्त है,” खरगोश ने झिड़कते हुए अपनी पत्नी से कहा.
खरगोश ने पत्नी की एक न सुनी और सियार से मित्रता करने चल दिया.
“नमस्ते बाबा, मेरा नाम टिकमा खरगोश है. हम इस वन में नये-नये आये हैं. निकट ही हमारा घर है. आप कहाँ रहते हैं?”
सियार मन ही मन मुस्कराया. वह जानता था कि खरगोश उसकी चाल में फंस गया है. अपनी प्रसन्नता छिपाते हुए उसने कहा, “बेटा, मैं तुम्हारा पड़ोसी हूँ. बूढ़ा हूँ. बिलकुल अकेला हूँ. बहुत दुःखी हूँ.”
“आप दुःखी क्यों हैं?”
“इस वन में न कोई मुझ बूढ़े से बात करता. न कोई मेरे घर आता. न कोई मुझे अपने घर बुलाता.” 
“बाबा, हम आपको अपने घर बुलायेंगे और हम आपके घर भी आयेंगे.”
“तुम आओगे मेरे घर? अवश्य आना, आज ही आना. अपनी पत्नी को भी साथ लाना. मैं तुम्हें गाजरें खिलाऊंगा. ऐसी मीठी गाजरें तुम ने आज तक ना खाई होंगी,” सियार ने प्रसन्नता से कहा.
टिकमा यही तो चाहता था. झट से बोला, “हम आज ही आप के घर आयेंगे.”
लौट कर उसने टिकमी को सारी बात बताई.
“मैं सियार के घर कभी न जाऊंगी. और मेरी मानो तो तुम भी न जाओ,” टिकमी ने कहा.
टिकमा अकेला ही सियार के घर आया. उसे अकेला देख सियार थोड़ा निराश हुआ. वह मन ही मन बोला, “सोचा था दोनों इकट्ठे ही फंस जायेंगे. चलो, आज एक को खा कर पेट भर लूंगा.”
जैसे ही खरगोश सियार के घर की भीतर आया सियार ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर, ताला लगा दिया. खरगोश को आश्चर्य हुआ. उसने पूछा, “दरवाज़े पर ताला क्यों लगाया?”
“वह इसलिये कि जब मैं तुम्हें भून कर खाऊं तो कोई मुझे यहाँ आकर तंग न करे.” इतना कह सियार ज़ोर से हंसा.
टिकमा के होश उड़ गये. मन ही मन उसने अपने आप से कहा, “ टिकमी ठीक कहती थी. यह सियार तो बड़ा धूर्त है. गाजरों का लालच दी कर इसने मुझे फांस लिया है. अब मुझे कोई नहीं बचा सकता.”
तभी किसी ने ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया. सियार हक्का बक्का रह गया. उसने सोचा भी न था कि इस समय कोई उसके घर आ जायेगा. टिकमा को पकड़ कर उसने एक संदूक में बंद कर दिया. फिर उसने दरवाज़ा खोला. बाहर शंकर हाथी और टिकमी थे. सियार की सिट्टी पिट्टी गम हो गई. वह शंकर हाथी से बहुत डरता था.
“टिकमा कहाँ है?” शंकर गरजा.
“यहाँ नहीं है,” सियार ने धीमे से कहा.
हाथी ने सियार को एक ओर धकेल दिया और घर के भीतर आ गया. उसने सब जगह ढूंढा पर टिकमा कहीं न मिला. तभी टिकमी ने देखा कि एक संदूक से एक शर्ट का कोना बाहर लटक रहा है. ऐसी ही शर्ट टिकमा ने पहन रखी थी. उसने शंकर को बताया. शंकर ने संदूक खोला. टिकमा संदूक के अंदर था. टिकमा को संदूक में बंद करते समय सियार ने जल्दी में ध्यान ही न दिया था कि उसके शर्ट का एक कोना संदूक के बाहर ही लटक रहा था. इतनी सी भूल के कारण वह पकड़ा गया.
शंकर हाथी ने गरज कर सियार से कहा, “तुम सुधरने वाले नहीं हो. तुम्हारा भलाई इसी में है कि तुम इस वन को छोड़ कर कहीं ओर चले जाओ. आज अगर मुझे गुस्सा आ गया तो तुम्हारी जान भी जा सकती है.”
“दादा, इस बुढ़ापे में मैं कहाँ जाऊंगा. मुझ पर दया करो और मुझे यहीं रहने दो. अब मैं किसी को तंग न करूंगा, मैं वचन देता हूँ,” सियार ने रोते-रोते कहा.
“आंसू बहाने से कुछ न होगा. सब तुम्हारी मक्कारियों से तंग आ चुके हैं. भागते हो या करूं तुम्हारी ठुकाई,” शंकर ने डांटते हुए कहा.
शंकर का गुस्सा देख सियार समझ गया कि जान बचा कर भागने में ही अब उसके भलाई है. वह दुम दबा कर भाग निकला. टिकमा और टिकमी खिलखिला कर हंस दिए.
टिकमी ने कहा, “अगर शंकर दादा संयोगवश इसी समय हम से मिलने न आते तो आज तुम बच न पाते. जब मैंने इन्हें बताया कि तुम सियार के घर गये हो तो यह समझ गये कि तुम सियार की चाल में फंस गये हो. और तुरंत तुम्हारी सहायता करने इधर आ गये.”
टिकमा ने हाथ जोड़ कर शंकर हाथी को नमस्कार किया और उन्हें धन्यवाद दिया.
शंकर ने टिकमा से कहा, “ मित्र अवश्य बनाओ, पर ज़रा सोच-समझ कर. धूर्त की मित्रता में सदा हानि ही होती है.”

© आई बी अरोड़ा 

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