Wednesday, 22 June 2016

बौना सियार
जंगल में रहता था इक बौना सियार
उस बेचारे बौने का था न कोई यार
शिकार पकड़ने में था वो थोड़ा कच्चा
इस कारण हरदम खा जाता था वो गच्चा
दस बार करता था कोशिश फिर भी रह जाता था भूखा
मुसीबत बढ़ जाती थी जब वन में पड़ जाता था सूखा
उस जंगल में ही रहता था एक घमंडी बाघ
देख उसे सब डर जाते थे और झटपट पड़ते थे भाग
सब कतराते थे बाघ से कोई न रहता था उसके साथ
हर पल रहता था अकेला कोई न करता था उससे बात
इक दिन सियार ने यूँ सोचा, ‘अगर करूं दोस्ती बाघ से  
झूठन ही दे देगा मुझको शायद वो अपने शिकार से’ 
बाघ के कान लगा अब सियार मीठी बातों से भरने
अवसर मिलते ही वो लग जाता उसकी सेवा करने
चिकनी चुपड़ी बातों पर किस का मन न डोला
एक दिन मुस्कुरा कर घमंडी बाघ यूँ सियार से बोला,
‘तुम्हारी मीठी-मीठी बातें लगतीं मुझको बहुत ही अच्छी
हम दोनों अब साथ रहेंगे बात कहूँ मैं बिल्कुल सच्ची.’
अब सियार के दिन पलटे खूब मज़े से था खाता
बाघ के हर शिकार में वो भी था थोड़ा हिस्सा पा जाता  
पर घमंडी बाघ धूर्त बहुत था करता था न सही व्यवहार
सियार बेचारे को हर दम दौड़ाता था वो बारंबार
इक खरगोश कहीं से आ पहुंचा इक दिन उस वन में
इसे चबा कर खाऊं बात आई घमंडी बाघ के मन में
बाघ ने सियार को पास बुलाया और ज़ोर से चिल्लाया
‘पकड़ो इस खरगोश को तुम इसको खाने का मन कर आया’
सियार बेचारा सहम गया और हुआ बहुत हैरान
वो जानता था कि न कर पायेगा वो ऐसा काम 
फिर भी झटपट भागा और इधर-उधर वो दौड़ा
खरगोश का पीछा करते-करते वन का कोई कोना न छोड़ा
खरगोश का पीछा उस बेचारे ने दिन भर खूब किया
सांझ हुई तो नदी किनारे रुक कर थोड़ा पानी पीया
लौट आया फिर वह सिर अपना लटकाए
लेकिन खाली हाथ लौटने पर उसने बाघ के घूंसे ही खाए
सियार की आँखों से आंसू लगे झरझर बहने
धूर्त बाघ के अत्याचार पड़े थे उसको कई बार सहने
गुमसुम खोया खोया सा वो आ बैठा झील किनारे
नभ में देखा चमक रहा था चाँद और कई सितारे
चाँद के दब्बों को देख उसके मन आई इक बात
बाघ को सबक सिखाने को यह थी अच्छी रात
बाघ से उसने यूँ कहा पर थोड़ा अदब से झुककर
‘बात मेरी सुन लें श्रीमान आप थोड़ा यहाँ रूककर
बदमाश खरगोश छिप गया है चाँद के ऊपर चढ़ कर
चाँद अभी तो है आकाश में सीधा हम सब के ऊपर
पर श्रीमान चाँद को कुछ देर में नीचे आना ही होगा
बड़ी झील के रास्ते ही चाँद को अपने घर जाना होगा
तब झील में कूद कर जा सकते है चाँद के ऊपर आप
और उस खरगोश को पकड़ चबा कर खा सकते हैं आप’
ऊपर आकाश की ओर देखा तब उस घमंडी बाघ ने
चाँद पर देखी एक परछाई और सारी बात आई समझ में
देर रात में दोनों आये चुपचाप झील किनारे
वन के पशु-पक्षी सोये थे तब गहरी नींद में सारे
जैसे ही चाँद दिखाई दिया उस झील के अंदर
बाघ ने कूद लगाई पर चढ़ न पाया चाँद के ऊपर  
एक मगरमच्छ भी रहता था उस झील में सबसे छिप के
झील में कोई आता तो नथुने फूल जाते थे उसके
मगरमच्छ था सोया जब लगाई बाघ ने छलांग
मगरमच्छ ने मारा झपटा और पकड़ ली उसकी दायीं टाँग
‘छोड़ो मुझे, चाँद पर छिपे खरगोश का करना है मुझे शिकार
अगर खरगोश भाग गया तो कोशिश हो जायेगी मेरी बेकार’
सुन बाघ की बात आई मगरमच्छ को खूब हंसी
पर बाघ की टाँग रही तब भी उसके दांतों में फंसी
‘मूर्ख, जो दिखता है पानी में वो चाँद नहीं है उसकी परछाई
और चाँद पर जो है, वो खरगोश नहीं, है मेरा इक दुष्ट भाई’
अब समझा बाघ कि सियार ने उसको था मुसीबत में फंसाया  
सियार पर किये अत्याचारों का फल था उसने पाया
अपनी जान बचाने को बाघ ने किये बहुत प्रयास
और चिल्ला कर सियार को भी पुकारा पर वो न आया पास
हाथ पैर अपने तब घमंडी बाघ ने खूब चलाये
न चाह कर भी उसके मुंह से निकल गयी इक हाय
बहुत मशक्त करने पर ही उसने पाया छुटकारा
पर इतने में ही घमंड उसका टूट चुका था सारा
बाहर आकर उसने पाया टूट चुकी थी उसकी टाँग
अब न वो दौड़ सकेगा न लगा पायेगा कोई छलांग
बाघ की हालत देख कर कोई पशु न हुआ हैरान
अब बाघ न कर पायेगा अपनी शक्ति पर अभिमान
जंगल में रहता है इक बौना सियार
वन के कई पशु हैं उस बौने के यार
शिकार पकड़ने में अब भी है वो थोड़ा कच्चा
पर मित्रों के संग सब कुछ खाता है मित्रों का संग है सच्चा.

© आइ बी अरोड़ा 

No comments:

Post a Comment